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Wednesday, March 25, 2026
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केदारनाथ की प्रतिष्ठा के बहाने सेंकी जाती राजनीति की रोटियां अधूरी यात्रा पूरी हुई लेकिन सवाल छोड़ गई अनेक

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दिनेश शास्त्री

कांग्रेस की बहुप्रचारित केदारनाथ धाम प्रतिष्ठा रक्षा यात्रा दो चरणों में संपन्न हो गई लेकिन कई सवाल छोड़ गई है। निसंदेह कांग्रेस की यह यात्रा केदारनाथ में होने वाले विधानसभा उपचुनाव के मद्देनजर पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने की कसरत का ही हिस्सा थी। अगर दस जुलाई को केदारनाथ की विधायक शैलारानी रावत का असामयिक निधन न हुआ होता तो शायद कांग्रेस के तेवर इतने तीखे भी न होते। संयोग यह था कि उसी दिन दिल्ली में सीएम धामी ने रौतेला के केदारनाथ धाम ट्रस्ट के मन्दिर का भूमि पूजन किया था। बस फिर क्या था। कांग्रेस को बैठे बिठाए मुद्दा मिल गया और उसे लगा कि जिस तरह मंगलौर और बदरीनाथ में पार्टी दो सीटें जीती है, उसी तरह केदारनाथ सीट भी हाथ लग जायेगी। केदारनाथ के उपचुनाव में कौन जीतेगा, यह तो समय बताएगा लेकिन जब बेहद लूज बॉल फेंक कर बल्लेबाज ठीक से न खेल पाए और बॉल बल्ले का बाहरी किनारे पर आए तो कैच लपकने की चूक कैसे हो सकती है। यही मौका कांग्रेस के हाथ लगा और पटकथा लिखी गई – केदारनाथ प्रतिष्ठा रक्षा यात्रा की। एक सवाल तो कांग्रेस से बनता है कि क्या पार्टी की लाइन हर प्रदेश के लिए अलग अलग होती है और इसकी छूट आलाकमान दे चुका है? यह सवाल इसलिए प्रासंगिक है कि जब कांग्रेस की यात्रा संपन्न होने जा रही थी, उसी समय कर्नाटक में तुष्टिकरण के चलते मंडप से गणपति जी को एक तरह से कैद किया जा रहा था। सनातन की सेवा का यह विरोधाभास देश ही नहीं दुनिया ने नंगी आंखों से देखा है। विशेष समुदाय के एतराज के बाद कर्नाटक में गणपति पूजन रोक दिया गया। यानी वहां के लिए मुहब्बत की दुकान में अलग सामान और उत्तराखंड की मुहब्बत की दुकान में दूसरा माल। इसे किस रूप में लिया जाना चाहिए, जवाब की दरकार तो कांग्रेस के नेताओं से ही रहेगी।
दूर क्यों जाना? पड़ोसी हिमाचल की राजधानी शिमला के पास संजोली मस्जिद का मामला विधानसभा में कांग्रेस के मंत्री ने ही उठाया, लोग आंदोलित हुए तो सरकार वहां भी न्यायिक विचाराधीन मामला बता कर पर्दा डालने की कोशिश करती दिख रही है। निसंदेह संजोली मामले में भाजपा भी बराबर की दोषी है। आखिर सुक्खू से पहले तो जयराम ठाकुर ही तो मुख्यमंत्री थे। उनके कार्यकाल में भी मस्जिद का विस्तारीकरण जारी था। भाजपा इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकती कि मौजूदा समस्या को बनाए रखने में उसका भी बराबर योगदान है। उसे भी बरी नहीं किया जा सकता। यह हाल तब है जब हिमाचल में सख्त भू कानून लागू है और उसके बावजूद विवादास्पद मस्जिद को वक्फ बोर्ड अपनी संपत्ति बता रहा है जबकि सरकारी रिकॉर्ड में जमीन हिमाचल सरकार की है।
निसंदेह लोकतंत्र में हर पार्टी को राजनीति करने का हक है और कांग्रेस को इससे प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। किंतु लाख टके का सवाल यह है कि एक छोटे से राज्य में सनातन की रक्षक दिखने की कोशिश कर रही कांग्रेस दूसरे राज्यों में नुकसान की कीमत पर यह सब करने का साहस दिखा सकती है? क्या कर्नाटक के कांग्रेसी हों या तमिलनाडु के गठबंधन सहयोगी इस दोहरे आचरण से कांग्रेस की नीयत पर संदेह तो नहीं करेंगे?
कहना न होगा कि हिमाचल के मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने जिस तरह से प्रादेशिक अस्मिता की बात कर वहां जो मुद्दा उठाया है वह एक शांत झील में पत्थर उछाल कर हलचल पैदा करने वाला घटनाक्रम तो है ही और इससे वहां के तमाम लोग उद्वेलित होकर सड़कों पर उतर आए। जाहिर है इससे नुकसान कांग्रेस का ही हुआ है और जिस तरह से मामले को मिनिमाइज करने की कोशिश सुक्खू सरकार कर रही है, उसकी आंच से वह बच पाएगी, इसमें संदेह है। बहुत संभव है पार्टी की विचारधारा के विपरीत आचरण करने यानी वोट बैंक को नाराज करने के कारण अनिरुद्ध सिंह की कुर्सी छिन न जाए। विक्रमादित्य सिंह ने इस मामले में बहुत संजीदगी दिखाई है। वे अपने लोगों के साथ भी दिख रहे हैं और पार्टी के साथ ही। इस तरह का डिप्लोमेटिक आचरण वही कर सकते थे। अनिरुद्ध सिंह तो हिमाचल की अस्मिता के चलते बलि का बकरा बन जाएं, इससे इनकार कैसे किया जा सकता है?
अब बात वापस उत्तराखंड की। मान लिया जाए कि केदारनाथ के नाम पर राजनीति से कांग्रेस यहां लाभ अर्जित कर ले लेकिन क्या पार्टी का आलाकमान इसे बर्दाश्त कर लेगा। प्रकट रूप से तो बीती 31 जुलाई को आपदा के चलते जब कांग्रेस ने यात्रा सोनप्रयाग में स्थगित की थी, तब बोला गया था कि राहुल जी के निर्देश के बाद यह निर्णय लिया गया है लेकिन उत्तराखंड के लोग कांग्रेस के दोहरे आचरण के बारे में तो पूछेंगे ही कि जब आपको कर्नाटक ने गणपति से परहेज है तो उत्तराखंड में बाबा केदार के प्रति इतनी भक्ति कैसे उमड़ रही है। आखिर गणपति के पिता तो बाबा केदार ही हैं। गुड़ अच्छा और गुलगुले से परहेज कैसे हो सकता है? क्या आपको नहीं लगता कि कांग्रेस नेताओं को एक बार दिल्ली पूछ लेना चाहिए कि धर्म के मामले में किस हद तक जाना चाहिए।
वैसे देखा जाए तो दो एपिसोड में हुई कांग्रेस की प्रतिष्ठा रक्षा यात्रा से केदारनाथ की प्रतिष्ठा न बड़ी है और न घटी है। बाबा केदारनाथ की प्रतिष्ठा यथावत थी, यथावत है और यथावत रहेगी। सरकार किसी की भी रही हो या भविष्य में जो भी सरकार में आए, केदारनाथ की प्रतिष्ठा अविचल है। उसके लिए दुबले होने की किसी को जरूरत नहीं है। इस वर्ष अगर आज तक सवा 11 लाख श्रद्धालु केदारनाथ धाम के दर्शन कर चुके हैं तो ये धाम की प्रतिष्ठा का ही प्रमाण है। हां कांग्रेस इस बहाने कुछ राजनीतिक रोटियां सेंक ले तो ये उसका पुरुषार्थ है और उससे उसे रोका भी नहीं जा सकता, आखिर लूज बॉल फेंक कर विकेट गंवाने का मौका उसे आपने ही तो दिया।

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