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Wednesday, March 25, 2026
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प्रगति मैदान में गढ़वाली भाषा को लेकर हुआ विमर्श

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शिक्षाविद साकेत बहुगुणा ने कहा – दैनिक जीवन में व्यवहार में लाएं गढ़वाली भाषा

नई दिल्ली।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेला 2025 के सेमिनार हाल नं 2 में लेखक मंच में “गढ़वाली भाषा के रचना संसार” विषय पर एक संवाद सत्र आयोजित किया गया। सत्र का आयोजन विनसर पब्लिकेशन कंपनी और धाद ने संयुक्त रूप से किया था। विनसर के संचालक कीर्ति नवानी ने कार्यक्रम में आगंतुक लेखकों और पुस्तक प्रेमियों का स्वागत किया। गढ़वाली भाषा के रचना संसार पर केन्द्रित इस संवाद सत्र में प्रसिद्ध रंगकर्मी प्रो. (डॉ.) डी. आर. पुरोहित ने बीज व्याख्यान दिया। उन्होंने गढ़वाली भाषा के उद्गम और विकास पर विस्तार से प्रकाश डाला तथा वैश्विक धरोहर घोषित रम्माण और गढ़वाल में होने वाली रामलीलाओं के बारे में ज्ञानवर्धन किया।
इस मौके पर डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक द्वारा तैयार “हिमालय में राम और रम्माण” शीर्षक से दो पिक्टोरियल पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया। वरिष्ठ पत्रकार मनु पंवार ने भी सत्र में अपनी बात रखी।
अपने संबोधन में केंद्रीय हिंदी संस्थान, शिक्षा मंत्रालय में भाषाविज्ञान के सहायक प्रोफेसर साकेत बहुगुणा ने कहा कि गढ़वाली एक समृद्ध भाषा है जिसका लिखित साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। अनेक शिलालेखों और अन्य प्रलेख इसके राजभाषा के रूप में प्रयुक्त किए जाने के जीवंत प्रमाण हैं। पिछली दो शताब्दियों में बड़ी संख्या में साहित्यकारों ने गढ़वाली भाषा में साहित्य की प्रत्येक विधाओं में रचनायें की हैं और उन्हें सरकारी सहयोग न मिलने के बावजूद पुस्तक रूप में प्रकाशित भी किया है जिसके लिए सभी भाषाप्रेमी उनके ऋणी हैं। गढ़वाली भाषा के संवर्धन में विनसर प्रकाशन और धाद गढ़वाली मासिक पत्रिका की भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है जिसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं।
साकेत बहुगुणा ने कहा कि मातृभाषा की चिंता मात्र से कोई लाभ नहीं है, हमें अपने दैनिक जीवन में गढ़वाली भाषा का प्रयोग करना चाहिए। कोई भी भाषा तभी तक जीवित रहती है, जब तक उसका उपयोग किया जाता है। सभी उत्तराखंडवासियों और प्रवासियों को अपनी अगली पीढ़ी से अपनी भाषा में ही संवाद करना चाहिए तभी वो अपनी भाषा से जुड़े रहेंगे। अपनी नई पीढ़ी को गढ़वाली भाषा के उपलब्ध समृद्ध साहित्य भंडार से भी परिचित करवाना हम सभी का दायित्व है। साथ ही, आज के सोशल मीडिया के इस दौर में हमें आभासी जगत में भी अपनी मातृभाषा का उपयोग गर्व के साथ करना चाहिए। संवाद सत्र का संयोजन धाद के संपादक और गढ़वाली के सशक्त हस्ताक्षर गणेश खुगशाल गणी ने किया।
विनसर पब्लिशिंग कंपनी के स्टॉल पर बड़ी संख्या में पाठकों ने मातृभाषा के साहित्य में दिलचस्पी दिखाई। स्टॉल पर उत्तराखंड के लोकमानस को वाणी देने वाले नरेंद्र सिंह नेगी के सृजन के साथ उनके रचनाकर्म की मीमांसा पर आधारित पुस्तकों ने पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया है। श्री नेगी के गीत संग्रह खुचकण्डि, अब जबकि, तेरी खुद तेरो ख्याल, गाणियों की गंगा स्याणीयों का समोदर के अलावा मुट्ठ बोटिक रख को काफी पसंद किया गया किंतु उससे अधिक आईएएस अधिकारी ललित मोहन रयाल द्वारा श्री नेगी के एक सौ एक गीतों की व्याख्या “कल फिर सुबह होगी” तथा गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा संपादित “नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों में जनसरोकार” और सृजन से साक्षात्कार पुस्तकों को पसंद किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त पूर्व पुलिस महानिदेशक अनिल रतूड़ी के उपन्यास भंवर और खाकी में स्थितप्रज्ञ के प्रति भी पाठकों ने दिलचस्पी दिखाई। उत्तराखंड के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, पर्यावरण तथा आस्था अध्यात्म के प्रति भी पाठकों की दिलचस्पी देखने योग्य थी। विनसर पब्लिशिंग कंपनी द्वारा प्रकाशित विनसर ईयर बुक 2025 के प्रति भी पाठकों का खासा आकर्षण रहा।

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