उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की सड़कें गुरुवार को ग्राम प्रधानों के भारी विरोध-प्रदर्शन और नारों से गूंज उठीं। अपनी 10 सूत्रीय मांगों को लेकर पूरे प्रदेशभर से आए हजारों ग्राम प्रधानों ने एकजुट होकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। परेड ग्राउंड में इकट्ठा होने के बाद जब प्रधानों का जनसैलाब विशाल रैली के रूप में सचिवालय घेरने आगे बढ़ा, तो पूरे शहर में हड़कंप मच गया।
देहरादून में ग्राम प्रधानों का हल्लाबोल
प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस को सचिवालय से काफी पहले पुलिस मुख्यालय के पास भारी बैरिकेडिंग लगानी पड़ी। बैरिकेडिंग पर आगे बढ़ने को लेकर पुलिसकर्मियों और आंदोलित ग्राम प्रधानों के बीच तीखी बहस और काफी धक्का-मुक्की हुई। प्रधानों का साफ कहना है कि जब तक सरकार उनकी जायज मांगों पर कोई ठोस फैसला नहीं लेती, तब तक यह लड़ाई थमने वाली नहीं है।
ग्राम प्रधान संगठन के बड़े नेताओं और वक्ताओं ने हुंकार भरते हुए कहा कि यह आंदोलन सिर्फ प्रधानों की जेब या मानदेय तक सीमित नहीं है। यह उत्तराखंड के दूर-दराज और पहाड़ी गांवों के अस्तित्व, युवाओं के रोजगार और पंचायतों के अधिकारों को बचाने की जंग है। पंचायतों को दरकिनार करके गांवों का विकास मुमकिन नहीं है।
ऑनलाइन हाजिरी बनी सबसे बड़ा सिरदर्द
प्रदर्शन में सबसे बड़ा और तीखा मुद्दा ‘वीबी-जी राम जी योजना’ के तहत मजदूरों की अनिवार्य ऑनलाइन हाजिरी (NMS) को लेकर उठा। प्रधानों का कहना है कि उत्तराखंड के पहाड़ी और सीमांत गांवों में मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट की हालत किसी से छिपी नहीं है।अक्सर नेटवर्क गायब रहने की वजह से कार्यस्थल पर मजदूरों की हाजिरी समय पर दर्ज नहीं हो पाती। इसका सीधा नुकसान गरीब मजदूरों को उठाना पड़ता है और उनका भुगतान अटक जाता है। प्रधान संगठन की पुरजोर मांग है कि जब तक हर गांव में मजबूत नेटवर्क न हो, तब तक ऑनलाइन हाजिरी की व्यवस्था खत्म कर पुरानी ऑफलाइन हाजिरी लागू की जाए, ताकि किसी भी मजदूर की रोजी-रोटी न छिने।
20 हजार मानदेय और पेंशन-बीमा की मांग
आर्थिक सुरक्षा को लेकर ग्राम प्रधानों ने सरकार से मांग की कि ग्राम प्रधानों का मासिक मानदेय बढ़ाकर कम से कम 20 हजार रुपये किया जाए। पंचायत की हर खुली बैठक में शामिल होने वाले वार्ड सदस्यों को भी मानदेय दिया जाए। सभी ग्राम प्रधानों के लिए स्वास्थ्य और जीवन बीमा की पक्की व्यवस्था की जाए।
‘गांव हमारा, काम हमारा, फिर भी हमें खबर क्यों नहीं?’
प्रधानों ने आरोप लगाया कि गांव में जब भी कोई दूसरा सरकारी विभाग विकास कार्य कराता है, तो स्थानीय ग्राम पंचायत या प्रधान को उसकी भनक तक नहीं लगने दी जाती। संगठन ने मांग रखी कि ग्राम पंचायत क्षेत्र में होने वाले हर विकास काम में पंचायत की भूमिका तय हो। 10 लाख रुपये तक के तमाम विकास कार्यों के निष्पादन की सीधी जिम्मेदारी (कार्यदायी संस्था) ग्राम पंचायत को ही बनाई जाए। पात्र गरीब परिवारों को बिना किसी रुकावट के प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) की प्राथमिकता सूची में जोड़ा जाए और पंचायतों पर थोपे गए 100 रुपये प्रति परिवार टैक्स में राहत दी जाए।
बजट बढ़ाओ और 29 विभागों के अधिकार दो
पंचायतीराज व्यवस्था का हवाला देते हुए प्रधानों ने कहा कि कागजों में दर्ज 29 विभागों के अधिकार धरातल पर सचमुच ग्राम पंचायतों को सौंपे जाएं। इसके अलावा, विधायक और सांसद निधि की तर्ज पर अलग से ‘ग्राम प्रधान निधि’ का गठन हो, ताकि आपात स्थिति और छोटे-मोटे कामों के लिए पंचायतों को किसी का मुंह न ताकना पड़े। साथ ही, राज्य और केंद्र वित्त आयोग का बजट गांवों की जनसंख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से बढ़ाने और जिला योजना की बैठकों में प्रधान संगठन को प्रतिनिधित्व देने की भी मांग उठाई गई।
जब तक फैसला नहीं, तब तक आंदोलन जारी
पिछले कई महीनों से ब्लॉक और जिला स्तर पर आवाज उठा रहे ग्राम प्रधानों ने अब राजधानी में अपनी ताकत दिखाकर सरकार को सीधा संदेश दे दिया है। ग्राम प्रधान संगठन की प्रदेश अध्यक्ष योगिता केन्तुरा रावत, प्रदेश महामंत्री प्रकाश मेहरा ,प्रदेश उपाध्यक्ष जसपाल सिंह जस्सी व संजय जोशी आदि का कहना है कि वे लंबे समय से शांतिपूर्वक अपनी बात रख रहे थे, लेकिन अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। यदि सरकार ने जल्द वार्ता बुलाकर उनकी 10 सूत्रीय मांगों का समाधान नहीं निकाला, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन और उग्र रूप लेगा।
Khabar Uttarakhand – Uttarakhand News.








