उत्तराखंड वन विभाग में अफसरों की तैनाती को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। वरिष्ठ भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने राज्य सरकार के दो हालिया आदेशों को रद्द करने की मांग की है। उन्होंने प्रमुख सचिव (वन) आर. के. सुधांशु को एक पत्र भेजकर आरोप लगाया है कि विभाग में एक ही अफसर को कई बड़े पद सौंप दिए गए हैं, जिससे काम के तरीके में Conflict of Interest पैदा हो रहा है और नियमों का उल्लंघन हो रहा है। संजीव चतुर्वेदी ने साफ किया है कि उनका विरोध किसी व्यक्तिगत अधिकारी से नहीं है, बल्कि सरकार की इस प्रशासनिक व्यवस्था से है।फिलहाल, इस पूरे मामले पर वन विभाग या राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
क्या हैं मुख्य आपत्तियां?
संजीव चतुर्वेदी की बसे बड़ी आपत्ति 1993 बैच की वरिष्ठ IFS अधिकारी नीना ग्रेवाल की तैनाती को लेकर है। उन्हें प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) का पद दिया गया है, जबकि वह पहले से ही मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक (Chief Wildlife Warden) और उत्तराखंड वन विकास निगम की प्रबंध निदेशक (MD) का प्रभार संभाल रही हैं। चतुर्वेदी का तर्क है कि वन विकास निगम का काम लकड़ी कटान और खनन जैसी व्यापारिक गतिविधियां चलाना है, जबकि मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक का काम जंगलों और जानवरों की सुरक्षा एवं कानूनी नियम लागू करना है। जब व्यापारी और नियामक (नियम बनाने वाला) एक ही व्यक्ति होगा, तो पारदर्शिता कैसे रहेगी ?
उन्होंने कार्बेट टाइगर रिजर्व के पखरो टाइगर सफारी में हुए अवैध निर्माण और पेड़ों की कटाई पर सुप्रीम कोर्ट के रुख का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अदालती आदेशों के सही पालन के लिए निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच जरूरी है। साथ ही, एक अजीब प्रशासनिक चूक भी सामने आई है। साल 2021 के एक सरकारी नियम के मुताबिक, मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के सालाना कामकाज की रिपोर्ट (CR) प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) लिखते हैं। जब दोनों पद एक ही अफसर के पास होंगे, तो इसका मतलब हुआ कि अधिकारी खुद ही अपने काम की समीक्षा करेगा!
अन्य अधिकारियों के पदों पर भी सवाल:
एस. पी. सुबुद्धि को ‘वन पंचायत’ के साथ-साथ ‘उत्तराखंड जैव विविधता बोर्ड’ के अध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। चतुर्वेदी के अनुसार, वैन पंचायत जैविक संसाधनों का प्रबंधन करती है और बोर्ड उस पर नियम लगाता है, जिससे यहां भी हित टकराते हैं। बी. के. गांगटे को कैम्पा (CAMPA) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाए गए बी. के. गांगटे की कैडर स्थिति, वेतन और पदों की अनुमति पर भी स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है।
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