उत्तराखंड की तराई-भाबर बेल्ट की सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील सितारगंज विधानसभा सीट पर 2027 के महासंग्राम की बिसात अभी से बिछ चुकी है। मगर SIR के पहले ही चरण में आए एक आंकड़े से सियासी गलियारों में हड़कंप है।
सितारगंज क्षेत्र से कटे 15,756 मतदाताओं के नाम
सितारगंज क्षेत्र से अचानक 15,756 मतदाताओं के नाम कट जाना कोई साधारण बात नहीं, बल्कि चुनावी नतीजों को पूरी तरह पलटने की ताकत रखता है। मौजूदा सितारगंज विधायक व कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा खुद इस स्थिति पर चिंता जाहिर कर चुके हैं। वह खुद ही कह चुके हैं कि उनके विधानसभा क्षेत्र पांच हजार यानी कुल 20 हजार वोट कट सकते हैं। तराई के इस हलके में वोटरों की छंटनी और प्रमुख नेताओं की दलबदलू राजनीति ने चुनावी समीकरणों को बेहद दिलचस्प बना दिया है।
क्यों बिगड़ा सत्ता और विपक्ष का समीकरण?
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी और कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा ने कांग्रेस के नवतेज पाल सिंह को 10,938 वोटों के अंतर से शिकस्त दी थी। यदि इस जीत के अंतर का हालिया मतदाता सूची के आंकड़ों से विश्लेषण करें, तो समीकरण काफी संवेदनशील नजर आते है क्योंकि बार मतदाता सूची से बाहर हुए 15,756 वोट पिछले जीत के अंतर से लगभग 4,800 अधिक हैं।
तराई की इस सीट पर यदि यह छंटनी किसी खास पॉकेट, क्षेत्र या समुदाय से हुई है, तो यह सीधे तौर पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के गणित को ध्वस्त कर सकती है। फिलहाल पूरे उत्तराखंड में 95 हजार वोटरों के ऑटोमेटेड फार्म-7 जेनरेट हो चुके हैं। इस प्रक्रिया का असर सितारगंज के भी कई अन्य वोटरों पर पड़ने की पूरी संभावना है, जिससे अंतिम वोटर लिस्ट आने तक आंकड़े और बदल सकते हैं।
35% वोट बैंक वाला ‘किंगमेकर’ बंगाली समुदाय
सितारगंज की राजनीति का सबसे असरदार यहाँ का बंगाली समुदाय है, जिनकी आबादी 33,000 से 45,000 के बीच है। यह सीट के कुल मतदाताओं का करीब 30% से 35% हिस्सा है। 1947 के विभाजन और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बाद शक्तिफार्म, गोविंद नगर, बैकुंठपुर और टैगोर नगर जैसी पुनर्वास बस्तियों में बसा यह समाज एकमुश्त ब्लॉक वोटिंग और 80% से अधिक मतदान के लिए जाना जाता है। बंगाली समाज का किसी भी दल को समर्थन तीन मुद्दों पर उसके रुख पर निर्भर करता है।
वर्ग-4 और नजूल भूमि को संक्रमणीय भूमिधर का अधिकार , जाति प्रमाण पत्रों से ‘पूर्वी पाकिस्तानी विस्थापित’ शब्द को हटाना और बेगुल नदी में प्रभावी बाढ़ नियंत्रण और ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं का विस्तार। 2012 में भाजपा के किरण मंडल की जीत और उसके बाद बहुगुणा परिवार (पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा व सौरभ बहुगुणा) का दबदबा इसी बंगाली वोट बैंक के मजबूत समर्थन पर टिका रहा है। यदि एसआईआर प्रक्रिया में हुई इस छंटनी में शक्तिफार्म बेल्ट के वोट प्रभावित हुए हैं, तो इसका सीधा नुकसान भाजपा के मजबूत किले को पहुंच सकता है।
नारायण पाल की कांग्रेस में वापसी और वोटों का जोड़-घटाव
वोटर लिस्ट में कटौती के बीच दूसरा बड़ा सियासी भूचाल पूर्व विधायक नारायण पाल की कांग्रेस में वापसी से आया है। 2002 और 2007 में बसपा से विधायक रहे नारायण पाल ने 2022 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर 9,258 वोट हासिल किए थे। वे 2022 में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार अजय जायसवाल (10,135 वोट) से कुछ ही पीछे रहे थे।
2022 के वोटों का विश्लेषणात्मक गणित को देखें तो भाजपा के सौरभ बहुगुणा को 43,354 वोट मिले थे।कांग्रेस नवतेज पाल सिंह को 32,416 वोट मिले थे और बसपा के 2022 में नारायण पाल को 9,258 वोट मिल थे। अगर नवतेज और नारायण पाल के वोट मिला लें तो 41,674 बनते हैं। यह आंकड़ा सौरभ बहुगुणा से महज 1,680 वोट दूर है। इसके अलावा, बसपा का पारंपरिक दलित-मुस्लिम कैडर वोट बैंक यदि कांग्रेस की ओर शिफ्ट होता है, तो मुकाबला पूरी तरह से बराबरी का हो जाएगा। हालांकि, नवतेज पाल सिंह और नारायण पाल दोनों के टिकट के मजबूत दावेदार होने के कारण कांग्रेस के सामने अंदरूनी भितरघात और गुटबाजी से बचने की बड़ी चुनौती होगी।
दलों के दावेदार और उनकी चुनौतियां
दलों में टिकटों के भाजपा केवर्तमान विधायक व कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा सबसे ताकतवर दावेदार हैं। वह पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पुत्र और दो बार के लगातार विधायक है। इनका शक्तिफार्म (बंगाली समुदाय) और ग्रामीण इलाकों में मजबूत व्यक्तिगत कैडर है। लेकिन 10 साल का कार्यकाल होने के कारण सत्तातरोधी लहर की बड़ी चुनौती तो है ही साथ में मतदाता सूची पुनरीक्षण से कटे 15,756 वोटों ने नई परेशानी खड़ी कर दी है। यदि पार्टी चेहरा बदलने की रणनीति बनाती है, तो स्थानीय बंगाली समाज या संगठन के किसी वरिष्ठ चेहरे पर विचार संभव है मगर फिलहाल सौरभ बहुगुणा ही पार्टी के प्राथमिक और निर्विवाद चेहरा बने हुए हैं।
कांग्रेस में टिकट को लेकर ज्यादा घमासान संभव है क्योंकि दो कद्दावर नेताओं के एक ही पाले में आ जाने से टिकट को लेकर खींचतान तेज होना तय है। नवतेज पाल सिंह 2022 में प्रत्याशी थे उन्होंने 32,416 वोट हासिल किए। उनकी किसान और पंजाबी/सिख वोट बैंक में मजबूत पकड़ है और पिछले 5 वर्षों से क्षेत्र में लगातार सक्रिय ह। मगर नारायण पाल के आने के बाद पार्टी के भीतर टिकट की सीधी होड़ दिखती है।
नारायण पाल दो बार के यानी 002 और 2007 में विधायक रहे। उनका अपना व्यक्तिगत दलित-मुस्लिम जनाधार है और 2022 में 9,258 वोट हासिल किए। लेकिन टिकट की बात होने पर नवतेज पाल खेमे की ओर से ‘बाहरी बनाम पुराने कार्यकर्ता’ का मसला उठाया जा सकता है। संभावना यह भी है कि 30-35% बंगाली वोट बैंक को साधने के लिए कांग्रेस का एक वर्ग स्थानीय बंगाली मसलन मालती बिशवास के चेहरे को आगे करने की वकालत कर सकता है।
आम आदमी पार्टी की बात करें तो 2022 में अजय जायसवाल ने 10,135 वोट हासिल कर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी। यदि वे पुनः मैदान में उतरते हैं, तो शहरी वोट बैंक में फिर से सेंध लगा सकते हैं, हालांकि वह पिछले लंबे समय से क्षेत्र से गायब हैं। बसपा की बात करें तो नारायण पाल के कांग्रेस में जाने के बाद बसपा नए दलित-मुस्लिम चेहरे की तलाश में है ताकि मुकाबले को त्रिकोणीय बनाया जा सके।
2027 में सौरभ बहुगुणा को देनी है दोहरी परीक्षा
कुल मिलाकर देखें तो कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा के सामने अब दोहरी चुनौती खड़ी है—एक तरफ भूमि अधिकार और जन कल्याणकारी योजनाओं के दम पर बंगाली समुदाय को अपने पक्ष में जोड़े रखना, तो दूसरी तरफ 15,756 कटे हुए वोटों के बाद बूथ स्तर पर दोबारा किलाबंदी करना। दूसरी तरफ, विपक्ष इस बड़े पैमाने पर हुई वोट कटौती को प्रशासनिक चूक या गड़बड़ी करार देकर पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा जुड़वाने के लिए अभियान चलाने की तैयारी में है। साफ है कि सितारगंज में 2027 का मुकाबला अब सिर्फ बड़े चेहरों की साख तक सीमित नहीं है, बल्कि हर एक कटे हुए वोट के जोड़-घटाव के इर्द-गिर्द सिमट चुका है।
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