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Wednesday, March 25, 2026
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हेली हादसा : सिस्टम की लापरवाही या गला काट स्पर्धा का सबब?

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दिनेश शास्त्री

  • रविवार की सुबह केदारनाथ धाम से छह श्रद्धालुओं को लौट रहे हेलीकॉप्टर की दुर्घटना ने चिंता की रेखाएं गहरी कर दी हैं। एक माह के दौरान केदारनाथ रूट पर यह तीसरा हादसा है। बीते माह 17 मई को केदारनाथ धाम में एयर एंबुलेंस दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी, उसके बाद सात जून को केदारनाथ राजमार्ग पर बड़ासू के पास हेलीकॉप्टर की एमरजेंसी लैंडिंग हुई और आज सुबह केदारनाथ से छह श्रद्धालुओं को लेकर लौट रहा आर्यन कंपनी का हेलीकॉप्टर गौरी खर्क में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हादसे में मंदिर समिति का कर्मचारी विक्रम रावत, पायलट राजवीर चौहान और पांच अन्य श्रद्धालु अकाल काल के गाल में समा गए। सात जून को बड़ासु हादसे के बाद मुख्यमंत्री ने घोषणा की थी कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में पायलटों के अनुभव तथा अन्य कारकों पर नजर रखी जाएगी, ताकि हादसों की पुनरावृत्ति न हो। सीएम की घोषणा अपने आप में शासनादेश मानी जाती है तो सवाल यह उठता है कि क्या उत्तराखंड सिविल एविएशन डेवलपमेंट एजेंसी यानी यूकाडा को हादसे का इंतजार करने के बजाय तुरंत ही आदेश पर अमल कर देना चाहिए था। संभव है किया भी हो लेकिन यूकाडा की ओर से पिछले एक सप्ताह के दौरान ऐसा कोई कृत्य सामने नहीं आया कि सीएम की इच्छा को गंभीरता से लिया गया हो। अगर सिर्फ कागज के घोड़े दौड़े हों तो बात अलग है। कागज के घोड़े दौड़ते तो हर घर नल जल योजना के भी देखे जा सकते हैं, जब योजना की शत प्रतिशत सफलता के बाद भी दूर किसी जल स्रोत से सिर पर पानी ढोकर ला रही महिलाओं की तस्वीरें इसी महीने अखबारों में देखी गई थी।
    बहरहाल नागरिक उड्डयन के क्षेत्र में स्वाभाविक रूप से अतिरिक्त सतर्कता की अपेक्षा इसलिए भी की जाती है कि हेली सेवाओं के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में मानव जीवन की सुरक्षा की प्रत्याशा बेहद कम रहती है। अहमदाबाद विमान हादसे में एक को छोड़ सभी यात्रियों के काल कवलित हो जाने की घटना सबके सामने है। 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद सेना के हेलीकॉप्टर के गौरीकुंड में ही दुर्घटनाग्रस्त हो जाने के हादसे को कौन भूला होगा, जब श्रद्धालुओं को बचाने के अभियान में जुटे बहादुर सैनिकों को बलिदान देना पड़ा था। इसके अलावा भी कई ऐसे हादसे हो चुके हैं, जब पुण्य अर्जित करने की चाह में गए लोग वापस घर नहीं लौट पाए थे। केदारघाटी में वैसे भी हेली हादसे सिहरन पैदा ही नहीं करते बल्कि झकझोर कर रखते रहे हैं। गिनाने बैठें तो फेहरिस्त बहुत लम्बी हो जाती है।
    एक तो भूगोल की दृष्टि से भी केदार घाटी में हेली सेवाओं का संचालन निरापद नहीं है। गहरी और संकरी घाटी में हेली सेवाओं को साफ मौसम में भी देखें तो उसकी तुलना देहरादून के घंटाघर से आई तक चलने वाले पांच नंबर विक्रम से की जा सकती है, जब एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में यातायात के सारे नियम गौण हो जाते हैं। अधिक से अधिक चक्कर लगाने की गला काट स्पर्धा में सवारियों को ठूंस ठूंस कर भरा जाता है और सुरक्षा के तमाम मानक ताक पर रख दिए जाते हैं। केदारघाटी में इस समय नौ से अधिक हेली सेवाएं संचालित हो रही हैं। इनमें पवनहंस को छोड़ दिया जाए तो बाकी सभी की कोशिश यही रहती है कि अपने स्लॉट में अधिक से अधिक चक्कर लगा कर मोटा मुनाफा बटोरा जाए। वैसे भी टेक ऑफ से लैंडिंग तक की यह हेली सेवा बमुश्किल सात आठ मिनट की होती है। उसमें भी हेलीपैड पर जो दृश्य उभरता है वह नितांत डरावना होता है। हेली कंपनी के कारिंदे यात्रियों को दौड़ा कर ठूंसते हैं, यही हाल लैंडिंग के समय भी दिखता है, मानो एक पल की भी देरी हेली कंपनी को घाटे में धकेल देगी। तभी तो कभी हेली कर्मचारी का सिर कटने की खबर से सामना होता रहा है तो कभी सेल्फी लेते अधिकारी की मौत की खबर मिलती रही है। यही नहीं जब तब एक के बाद एक दुखद घटना आए दिन सामने आती रहती हैं लेकिन सिस्टम है कि हेली कंपनियों को पूरी छूट देने के लिए विवश नजर आता है। जाहिर सी बात है कि जब राज्य का मुखिया नकेल कसने की बात कह रहा हो तो सिस्टम को उसे फॉलो करते दिखना भी चाहिए किंतु व्यवहार में यह सब होता नहीं दिखता है। संभव है कि सिस्टम में बैठे लोग उल्टे सवाल कर दें कि हम जो कुछ कर रहे हैं, क्या बताना जरूरी है या अपनी खाल बचाने के लिए यह भी कह सकते हैं कि हम तो अपने स्तर पर सब कुछ कर रहे हैं, कमी तो हेली कंपनियों की है जो लापरवाही बरत लेती हैं, उस स्थिति में पुलिस के ऑपरेशन लगाम की बात समीचीन हो जाती है कि आखिर सौ फीसद अनुपालन न भी हो रहा तो भी अवचेतन में नियंत्रण का एक दंड भय तो स्थापित करने में पुलिस सफल तो रही है कि लोग नियमों का पालन करने को तत्पर दिख जाते हैं।
    लगे हाथ एक और विषय पाठकों के विमर्श के लिए सामने रखना जरूरी लगता है। उत्तराखंड की आर्थिकी की धुरी चारधाम यात्रा गढ़वाल मंडल में ही संचालित होती है और गढ़वाल मंडल के सभी सातों जिले इस यात्रा व्यवस्था से जुड़े हैं। प्रशासनिक दृष्टि से व्यवस्थाओं के सुचारु संचालन, नियमन, नियंत्रण और सेवाओं के निष्पादन के लिए एक अदद पूर्णकालिक मंडलाधीश की दरकार हमेशा से रही है। मस्तिष्क पर बहुत ज्यादा जोर देने के बाद भी यह याद नहीं आता है कि उत्तराखंड बनने के बाद आखिरी बार पौड़ी में कमिश्नर को कब दफ्तर में बैठा देखा होगा। उत्तर प्रदेश के जमाने में जरूर पौड़ी में कमिश्नर दफ्तर काम करता था, अब वहां कैम्प ऑफिस ही शायद बचा हो। बेशक कागजों में देहरादून के ईसी रोड का दफ्तर कैम्प ऑफिस हो किंतु सत्य तो वह भी नहीं है। सवाल यह भी पूछा जाना चाहिए कि जब कुमाऊं में पूर्णकालिक कमिश्नर तैनात किया जा सकता है तो गढ़वाल के साथ भेदभाव क्यों। क्यों गढ़वाल के कमिश्नर को इतने सारे काम सौंप दिए जाते हैं कि वह अपने मूल दायित्व का निर्वहन करने लायक ही न रह पाए। कमिश्नर अपने मूल तैनाती स्थान पौड़ी में बैठे और उसके पास शासन की अतिरिक्त जिम्मेदारियों को छोड़ सिर्फ अपने मंडल की व्यवस्था सुचारू रखने का दायित्व हो तो उम्मीद की जा सकती है कि शायद कई सारी समस्याओं का स्वत: समाधान हो जाए। राजमार्ग, चारधाम यात्रा, सरकार की योजनाओं का क्रियान्वयन, निगरानी हेली सेवाओं पर नजर और वह सभी अपेक्षाएं पूर्ण हो सकती हैं किंतु नक्कारखाने की यह ध्वनि प्रतिध्वनि बन कर ही लौटेगी, इस पुकार, चीत्कार और गुहार पर न तो अतीत में विचार हो पाया और न ही भविष्य में उम्मीद की जानी चाहिए, क्योंकि गढ़वाल की नियति ही यही है। फिर भी आशावादी बने रहना चाहिए। पाठकों को भी यही दिलासा देने का मन होता है कि “हारिये न हिम्मत, बिसारिए न राम।”
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