उत्तराखंड का चर्चित अंकिता भंडारी मामला: सीबीआई की एंट्री और नार्को टेस्ट का कानूनी पेंच

उत्तराखंड के चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में अब जांच की सुई और गहरी होती जा रही है। मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा वीआईपी एंगल पर जांच शुरू किए जाने के बाद से राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। ताजा घटनाक्रम में, इस मामले से जुड़े पूर्व भाजपा विधायक सुरेश राठौर और उनकी कथित अभिनेत्री पत्नी उर्मिला सनावर ने अपने नार्को टेस्ट को लेकर लिखित सहमति दे दी है।

जैसे ही यह खबर बाहर आई, आम चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। हर कोई यही जानना चाहता है कि क्या नार्को टेस्ट में उगले गए राज कोर्ट में गुनहगारों को सजा दिलाने के लिए काफी होंगे? आइए बहुत आसान भाषा में समझते हैं कि कानून, अदालतें और मानवाधिकार इस तथाकथित ‘सच्चाई के इंजेक्शन’ या ‘नार्को टेस्ट’ के बारे में क्या कहते हैं।

क्या होता है नार्को टेस्ट और क्या अदालत इसे मानती है?

आम बोलचाल में लोग यह सोचते हैं कि एक बार आरोपी को सुलाकर या ‘ट्रूथ सीरम’ (सोडियम पेंटोथल) देकर सच उगलवा लिया, तो समझो केस जीत गए। लेकिन कानूनी रूप से ऐसा बिल्कुल नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2010 के अपने एक ऐतिहासिक फैसले (सेलवी बनाम कर्नाटक राज्य) में यह साफ कर दिया था कि किसी भी व्यक्ति का बिना उसकी मर्जी के नार्को टेस्ट कराना पूरी तरह असंवैधानिक है। यह हमारे संविधान के अनुच्छेद 20(3) (खुद के खिलाफ गवाही न देने का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (निजता और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है।

सबसे बड़ी बात यह है कि नार्को टेस्ट के दौरान दिए गए बयानों की अदालत में बतौर सबूत कोई सीधी कानूनी वैल्यू नहीं होती। कोई भी जज अकेले इस आधार पर किसी को सजा नहीं सुना सकता कि उसने नशे की हालत में अदालत के बाहर या लैब में क्या कबूल किया था।

अगर बयान के बाद मुकर जाएं या पहले ही मना कर दें?

लोगों के मन में यह सवाल सबसे ज्यादा आता है कि—अगर कोई लिखित सहमति दे दे और बाद में पलट जाए, तो क्या होगा?

सहमति कभी भी वापस ली जा सकती है

कानूनन, टेस्ट की टेबल पर लेटने के बाद भी अगर व्यक्ति कह दे कि “मैं टेस्ट नहीं कराना चाहता,” तो डॉक्टर या जांच एजेंसी जबरदस्ती नहीं कर सकती। इसे लगातार बनी रहने वाली ‘स्वैच्छिक सहमति’ (Continuous Voluntary Consent) कहा जाता है। ज़बरदस्ती करना सीधे तौर पर ‘मानसिक प्रताड़ना’ माना जाएगा।

मुकरने पर कोई गुनाह नहीं

यदि कोई आरोपी टेस्ट के बाद अपने बयानों से मुकर जाता है कि “मैंने तो नशे में कुछ भी बोल दिया था,” तो बचाव पक्ष के वकीलों को बहुत मजबूत आधार मिल जाता है। अदालतें ऐसे मौखिक बयानों को आसानी से खारिज कर देती हैं।

फिर नार्को टेस्ट का फायदा क्या है? असली खेल है धारा 27 का

अगर नार्को टेस्ट के दौरान कोई व्यक्ति पुलिस को कोई ऐसा गुप्त सुराग दे दे जिसके बारे में सिर्फ उसी को पता था। जैसे कि हत्या में इस्तेमाल हथियार (चाकू या रिवॉल्वर) कहां दबाया गया है, खून से सने कपड़े कहां छिपाए गए हैं, या कोई अन्य ठोस भौतिक सबूत (Physical Evidence)। यदि पुलिस उस बताए गए सुराग के आधार पर वास्तव में कोई ठोस सबूत या हथियार बरामद कर लेती है, तो फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आरोपी बाद में अपने मौखिक बयान से मुकर गया या नहीं। वह भौतिक बरामदगी और सबूत कोर्ट में पूरी तरह मान्य रहता है और गुनहगार पर शिकंजा कसने के लिए काफी होता है।

मानवाधिकार और दुनिया भर का नजरिया

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और संयुक्त राष्ट्र (UN) जैसे संगठन नार्को टेस्ट को आधुनिक युग का ‘थर्ड डिग्री टॉर्चर’ मानते हैं। उनका साफ कहना है कि किसी के अवचेतन मन से दवाइयों के जरिए जबरन राज निकलवाना उसकी मानसिक गरिमा और प्राइवेसी पर हमला है। यही वजह है कि अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप जैसे विकसित देशों में नार्को टेस्ट लगभग पूरी तरह प्रतिबंधित हैं।

केवल जुबान से दिया गया बयान कोर्ट में किसी को सजा नहीं दिला सकता

कुल मिलाकर कहा जाए तो अंकिता भंडारी मामले में पूर्व विधायक और उनकी पत्नी द्वारा नार्को टेस्ट के लिए सहमति देना भले ही जांच में एक बड़ा मोड़ लग रहा हो, लेकिन कानूनी हकीकत यही है कि केवल जुबान से दिया गया बयान कोर्ट में किसी को सजा नहीं दिला सकता। असली परीक्षा इस बात की होगी कि क्या इस प्रक्रिया से पुलिस या सीबीआई तक कोई ठोस, अदालती सबूत और बरामदगी हाथ लगती है या नहीं। आम जनता की नजरें अब इसी बात पर टिकी हैं कि इस हाई-प्रोफाइल मामले में आगे क्या नया मोड़ आता है।

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