धर्म नगरी हरिद्वार में धर्मशालाओं के अवैध हस्तांतरण और भू-माफियाओं के कब्जों की जांच से जुड़ी एक बेहद अहम प्रशासनिक फाइल गायब होने के मामले में उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग ने सख्त कार्रवाई की है। हरिद्वार डीएम कार्यालय के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी द्वारा जांच पत्रावली गायब होने की पुलिस में शिकायत (FIR) दर्ज न कराने और आरटीआई के तहत आवेदक को जानकारी न देने पर 20,000 का जुर्माना ठोका है। सूचना आयोग ने इसे सूचना का अधिकार अधिनियम का सीधा उल्लंघन और संवैधानिक संस्था के आदेशों की खुली अवहेलना माना है।
32 साल पुरानी जांच पत्रावली कार्यालय से हुई गायब
यह पूरा प्रकरण वर्ष 1994 से संचालित उस प्रशासनिक जांच पत्रावली (फाइल संख्या 25 फरवरी 1994) से जुड़ा है, जो धर्मार्थ धर्मशालाओं के अस्तित्व को बचाने के लिए शुरू की गई थी। आरोप है कि हरिद्वार की ऐतिहासिक और दान में दी गई धर्मशालाओं पर बिना जिला न्यायालय की अनुमति के लालची ट्रस्टियों और राजनीतिक सांठगांठ वाले भू-माफियाओं द्वारा अवैध रूप से खरीद-फरोख्त की जा रही थी। इतना ही नहीं, दशकों से सेवा दे रहे प्रबंधक परिवारों को जबरन बाहर निकालकर धर्मशालाओं को व्यावसायिक होटलों के रूप में चलाया जा रहा था।
इसी अवैध धंधे को रोकने के लिए अखिल भारतीय धर्मशाला प्रबंधक सभा के अध्यक्ष रमेश चंद्र शर्मा ने 19 अप्रैल 2021 को तत्कालीन कुंभ मेलाधिकारी दीपक रावत से मुलाकात कर शिकायत दर्ज कराई थी। मेलाधिकारी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 21 मई 2021 को पत्र (संख्या 3443/कु.मे.) जारी कर जिलाधिकारी को इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और बंद पड़ी धर्मशालाओं का सुचारू संचालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।
जब रमेश चंद्र शर्मा ने इस जांच की अपडेट स्थिति जाननी चाही, तो 30 सितंबर 2021 को मुख्य प्रशासनिक अधिकारी डी.सी. धीमान ने लिखित सूचना दी कि काफी खोजबीन के बाद भी धर्मशालाओं की जांच से संबंधित मूल पत्रावली (रिकॉर्ड)कार्यालय से गायब है और मिल नहीं रही है।
सूचना आयोग के आदेशों को 3 साल तक दबाए रखा
सरकारी रिकॉर्ड से इतने संवेदनशील मामले की फाइल गायब हो जाने पर रमेश चंद्र शर्मा ने राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील दाखिल की। मामले की सुनवाई करते हुए तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त अनिल चंद्र पुनेठा ने 30 नवंबर 2022 को अंतिम आदेश जारी किया। आयोग ने डीएम कार्यालय के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी को स्पष्ट निर्देश दिया था कि फाइल का गायब होना एक गंभीर विषय है, इसलिए इस संबंध में संबंधित पुलिस थाने में तत्काल प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई जाए। साथ ही दर्ज FIR की प्रति और मांगी गई बिंदुवार सूचनाएं आवेदक रमेश चंद्र शर्मा को जल्द से जल्द उपलब्ध कराई जाएं। हैरानी की बात यह रही कि आयोग के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद मुख्य प्रशासनिक अधिकारी ने लगातार तीन वर्षों तक न तो गायब फाइल की एफआईआर दर्ज कराई और न ही आवेदक को कोई सूचना प्रदान की।
चार बार मौका देने पर भी पेश नहीं हुए अफसर
मामले में कोई प्रगति न होने पर आवेदक रमेश चंद्र शर्मा ने 25 अप्रैल 2026 को धारा 18(1) के तहत सूचना आयोग में शिकायती अपील दर्ज कराई। इस शिकायत पर राज्य सूचना आयुक्त दिलीप सिंह कुंवर ने सुनवाई शुरू की।
सुनवाई के दौरान प्रशासनिक अधिकारी की ओर से कोई स्पष्ट आख्या या संतोषजनक जवाब पेश नहीं किया गया। सूचना आयुक्त ने अधिकारी को सुधार का अवसर देते हुए 8 जनवरी 2026, 18 मार्च 2026 और 1 जून 2026 समेत कुल चार बार “अंतिम अवसर” प्रदान किए। लेकिन अधिकारी न तो आयोग के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए और न ही आवेदक को सूचनाएं मुहैया कराईं।
आयोग की सख्त टिप्पणी और दंडात्मक आदेश
मुख्य प्रशासनिक अधिकारी की इस कार्यशैली और घोर लापरवाही पर कड़ा संज्ञान लेते हुए सूचना आयुक्त दिलीप सिंह कुंवर ने अपने आदेश में बेहद सख्त टिप्पणी की। आयोग ने कहा कि अधिकारी का रवैया स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि उनकी मंशा सूचना उपलब्ध कराने की है ही नहीं। यह न केवल आयोग के आदेशों का घोर उल्लंघन है, बल्कि आरटीआई अधिनियम 2005 की मूल आत्मा पर आघात है।
अधिकारी द्वारा जानबूझकर की गई इस अनदेखी और लापरवाही को अक्षम्य मानते हुए राज्य सूचना आयोग ने जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ 20,000 का दंडात्मक अर्थदंड (जुर्माना) लगाने का आदेश पारित कर दिया। आयोग के इस कड़े फैसले से प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
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