चौबट्टाखाल में टिका रहेगा ‘सतपाल महाराज’ का ‘राज’!, जानें क्या कहता है सियासी गणित

क्या चौबट्टाखाल में ‘महाराज’ का ‘राज’ बना रहेगा। प्रदेश के सियासी हलकों में यह सवाल तैर रहा है। पौड़ी गढ़वाल जिले का चौबट्टाखाल विधानसभा क्षेत्र उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण और हाई-प्रोफाइल विधानसभा क्षेत्र माना जाता है। वह इसलिए कि इस सीट पर पिछले तीन चुनाव से भाजपा का कब्जा रहा है और बीते दो चुनाव से भाजपा नेता व कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज इस सीट पर मजबूती से काबिज है।

क्या चौबट्टाखाल में बरकरार रहेगा ‘सतपाल महाराज’ का ‘राज’?

सवाल यह है कि तीन बार से भाजपा को वोट दे रहे मतदाता क्या चौथी बार भी भाजपा पर ही भरोसा करेंगे या तीन बार की एंटी इनकंबेंसी महाराज का राज खत्म कर देगी। चौबट्टाखाल सीट 2008 के परिसीमन के बाद पुराने बीरोंखाल और पोखड़ा-एकेश्वर क्षेत्रों के पुनर्गठन से वर्ष 2012 में अस्तित्व में आई थी। 2012 के विधानसभा चुनाव में चौबट्टाखाल भाजपा के तीरथ सिंह रावत ने कांग्रेस के राजपाल सिंह बिष्ट को 1,964 वोट से हराया था।

2016 में जब सतपाल महाराज कांग्रेस छोड़ भाजपा में आ गए तो भाजपा ने तीरथ का पत्ता काटकर महाराज को टिकट दिया। 2017 के चुनाव में सतपाल महाराज ने कांग्रेस के राजपाल सिंह बिष्ट को काफी बड़े अंतर यानी 7,354 मतों से हराया। 2022 के चुनाव में सतपाल महाराज और मजबूत हुए और उन्होंने कांग्रेस के केसर सिंह नेगी को 11,430 वोट से हराया। प्रदेश में जारी वोटर लिस्ट के SIR में चौबट्टाखाल में 9,746 वोट कट गए हैं, ऐसे में इस कटौती का असर भी होना ही होना है।

ठाकुर और ब्राह्मण के इर्द गिर्द घूमता है सियासी गणित

चौबट्टाखाल में मतदाता समीकरण मुख्य रूप से राजपूत (ठाकुर) और ब्राह्मण मतदाताओं के ईद-गिर्द घूमता है। ठाकुर मतदाताओं की संख्या निर्णायक मानी जाती है, जिसके कारण दोनों प्रमुख दल आमतौर पर इसी वर्ग से चेहरा चुनते हैं। पौड़ी गढ़वाल का हिस्सा होने के कारण यहां भूतपूर्व सैनिकों और सैन्य परिवारों की बड़ी आबादी है। राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा नीतियां यहां के चुनावी रुख को प्रभावित करती हैं। पलायन के कारण इस क्षेत्र में मतदान प्रतिशत काफी कम रहता है। यहां 2022 में मतदान प्रतिशत करीब 44.86 प्रतिशत और 2017 में 46.91 प्रतिशत रहा। यही कारण है कि कैडर वोट और स्थानीय प्रभाव वाले निर्दलीय उम्मीदवार समीकरण बिगाड़ने की क्षमता रखते हैं।

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टिकट के लिए हो सकती है खींचतान

संभावित टिकट दावेदारों में भाजपा की बात करें तो यहां सबसे बड़े दावेदार तो वर्तमान कैबिनेट मंत्री और वरिष्ठ नेता सतपाल महाराज ही हैं। हालांकि कभी-कभी सतपाल महाराज को लेकर चर्चा होती रहती है कि वे चौबट्टाखाल से अपने बेटे की सियासी पारी लांच कर सकते हैं। मगर ये चर्चाएं बहुत आगे नहीं बढ़ पाती। अगर ऐसा होता है तो पार्टी संगठन स्तर पर बदलाव का निर्णय भी लिया जा सकता है। ऐसे में स्थानीय जिला स्तरीय पदाधिकारी या आरएसएस से जुड़े वरिष्ठ चेहरे व बीरोंखाल और पोखड़ा क्षेत्रों से आने वाले भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता दावेदारी पेश कर सकते हैं।

स्थानीय कार्यकर्ताओं का एक वर्ग अक्सर यह तर्क देता है कि क्योंकि महाराज VVIP हैं और क्षेत्र में 24 घंटे उपलब्ध नहीं रहते ऐसे में क्षेत्र में किसी स्थानीय कैडर को अवसर मिलना चाहिए। इसके अलावा इस सीट से मुख्यमंत्री और सांसद रह चुके तीरथ सिंह रावत या उनके समर्थक महाराज को चुनौती दे सकते हैं। यही नहीं स्थानीय निकाय चुनावों के माध्यम से अपनी पहचान बनाने वाली महिला नेत्रियां भी महिला आरक्षण और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के आधार पर दावेदारी करती हैं। कांग्रेस से भाजपा में आने के बाद, मूल भाजपा कैडर में कई बार यह भावना देखने को मिली है कि पार्टी के पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को मौका मिलना चाहिए। यदि सतपाल महाराज को भविष्य में राष्ट्रीय राजनीति, लोकसभा चुनाव या किसी अन्य भूमिका में भेजा जाता है, तो चौबट्टाखाल में भाजपा की दूसरी पंक्ति के स्थानीय नेताओं की दावेदारी तुरंत आगे आ जाएगी।

चर्चाओं में है कांग्रेस के इन नेताओं का नाम

कांग्रेस की बात करें तो वहां जिन दावेदारों के नाम फिलहाल चर्चा में हैं उनमें 2022 में महाराज को चुनौती देने वाले केसर सिंह नेगी और 2012 और 2017 के पूर्व प्रत्याशी राजपाल सिंह बिष्ट शामिल हैं। इसी के साथ युवा कांग्रेस व अग्रिम संगठनों के कई स्थानीय नेता नए विकल्प के तौर पर पैरवी कर रहे हैं। यूकेडी (उत्तराखंड क्रांति दल) और 2022 में आम आदमी पार्टी से लड़े निर्दलीय प्रत्याशी दिग्मोहन नेगी भी क्षेत्रीय असंतोष को भुनाने के प्रयास में रहते हैं।

क्या अनसुलझे ये मुद्दे पलट सकते हैं बाजी

चौबट्टाखाल भले ही बीते तीन चुनाव से भाजपा के कब्जे में हो लेकिन यहां का पिछड़ापन और अनसुलझी समस्याओं में ही कुव्वत है कि वे चुनावी खेल पलट दें। असल में चौबट्टाखाल कैबिनेट मंत्री मिलने के बावजूद पलायन और खाली होते गांव की समस्या से ग्रस्त है। यहां रोजगार के साधनों का अभाव है। लोगों की खेती से आय घट रही है। बुनियादी सुविधाओं की कमी के चलते युवाओं का बड़े शहरों की ओर पलायन इस पहाड़ी क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या है। यहां प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों, पैरामेडिकल स्टाफ और आधुनिक जांच उपकरणों की भारी कमी बनी रहती है।

आपातकालीन स्थिति में मरीजों को कोटद्वार या ऋषिकेश-देहरादून की ओर भागना पड़ता है। दूरस्थ ग्रामीण इलाकों की सड़कों की खस्ताहाल स्थिति, भूस्खलन के कारण बाधित होने वाले संपर्क मार्ग और पेयजल की किल्लत प्रमुख स्थानीय जनसमस्याएं हैं। सूअर और बंदरों द्वारा फसलों को पहुंचाए जाने वाले नुकसान के कारण स्थानीय किसानों का कृषि से मोहभंग हो रहा है। विपक्षी दल अक्सर यह मुद्दा उठाते हैं कि बड़े कद का विधायक और मंत्री होने के बावजूद दूरस्थ गांवों को सीधा संवाद और अपेक्षित बुनियादी ढांचागत लाभ नहीं मिल पाया है। इन हालात में सतपाल महाराज चौबट्टाखाल में अपना राज कायम रख पाएंगे या नहीं ? इस सवाल का जवाब भविष्य की कोख में है।

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