उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 बीजेपी का बड़ा दांव!, क्या मिलेगा दलितों का साथ? – Khabar Uttarakhand

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उत्तराखंड में 2027 की चुनावी रणभोरी बच चुकी है। चुनावी बिसात भी बिछनी शुरू हो गई है। इसी बीच बीजेपी ने ऐसा दांव चला है जो उत्तराखंड में सीधे 17 प्रतिशत दलित वोट बैंक तक पहुंचने की कोशिश माना जा रहा है। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये रणनीति सच में काम करेगी? या उत्तराखंड की राजनीति का समीकरण कुछ और ही कहानी लिखेगा।

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव ज्यादा दूर नहीं है। ऐसे में सभी पार्टीयां अपने हथियारों में धार लगाना शुरू कर चुकी है। हालांकि वहीं बीजेपी ने इस चुनावी रणभूमि में अपनी बड़ी चाल चल दी है। जो सीधे प्रदेश के 17 फीसदी दलित वोटबैंक से जुड़ी है। जी हां, दरअसल बीजेपी ने संत रविदास की 650 वीं जयंती को केंद्र में रखकर देशभर में समरता संकल्प अभियान का बिगुल फूंक दिया है।

चुनावी रणभूमि में बीजेपी ने चल दी बड़ी चाल

जहां एक तरफ इस समरता संकल्प अभियान को लेकर बीजेपी का कहना है कि इससे हमारा उद्देश्य संत गुरु रविदास महाराज के समता, सामाजिक न्याय, बंधुत्व, सेवा और सामाजिक समरसता के संदेश को जन-जन तक पहुंचाना और विकसित भारत के निर्माण में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करना है। तो वहीं विपक्षी दल इसे चुनावी स्टंट बता रहा है।

पीएम मोदी ने संत रविदास एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जालंधर से संत रविदास एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाकर इस अभियान का आगाज किया था। जिसके बाद उत्तराखंड को भी इस समरता संकल्प अभियान का विशेष रणक्षेत्र माना जा रहा है। बीजेपी कि इस पूरी रणनीति की सबसे अहम कड़ी हैं।

उत्तराखंड में 107 रविदास मंदिर

उत्तराखंड के 107 रविदास मंदिर, इन्हीं मंदिरों को बीजेपी ने अभियान का केंद्र बनाया है। इस अभियान के दौरान वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर, जो संत रविदास की जन्मस्थली है, वहां से पवित्र मिट्टी के कलश उत्तराखंड समेत कई राज्यों में पहुंचेंगे। इसके बाद कलश यात्राएं होंगी, सामाजिक संवाद होंगे, संगोष्ठियां होंगी और कार्यक्रमों को बूथ स्तर तक ले जाने की तैयारी भी इस अभियान के जरीए बीजेपी लगातार कर रही है।

समरता संकल्प अभियान की शुरुआत

इस समरता संकल्प अभियान कि शुरुआत आज यानी की 29 जुलाई को गुरू पर्व के दिन से हुई है। ये अभियान 20 फरवरी 2027 तक चलने वाला। हालांकि संत रविदास के नाम पर शुरू हुआ बीजेपी का ये समरता संकल्प अभियान अब सीधे उत्तराखंड की सियासी बहस के केंद्र में आ गया है।

कांग्रेस का आरोप, बीजेपी का अभियान दलित समाज को साधने की चुनावी रणनीति

कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी का ये समरता संकल्प अभियान दलित समाज को साधने की चुनावी रणनीति है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता प्रतिमा सिंह ने इसे सीधा चुनावी स्टंट करार दिया। प्रतिमा सिंह ने इसे लेकर कहा है कि जिस पार्टी पर संविधान निर्माता बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों की उपेक्षा करने और संविधान की भावना को कमजोर करने के आरोप लगते रहे हैं। वो अब समरसता का पाठ कैसे पढ़ा सकती है।

हालांकि वहीं राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, बूथ स्तर तक पहुंचने वाली कोई भी मुहिम चुनावी नजरिए से बेहद जरूरी हो जाती है। खासकर तब जब विधानसभा चुनाव में बहुत ही कम वक्त बचा हो और पार्टियों में सामाजिक समीकरणों को अपने पक्ष में करने की होड़ तेज हो रही हो।

हरिद्वार का सियासी गणित दिलचस्प

हरिद्वार जैसे इलाके इस सियासी गणित को और दिलचस्प बना देते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2022 के चुनाव में हरिद्वार जिले की 11 विधानसभा सीटों में बीजेपी सिर्फ हरिद्वार, रुड़की और बीएचईएल रानीपुर सीट पर जीत दर्ज कर सकी थी। बाकी सीटों पर कांग्रेस, बसपा और निर्दलीय उम्मीदवार सफल रहे थे। ऐसे में आने वाले चुनाव में हरिद्वार समेत कई क्षेत्रों के सामाजिक समीकरण सभी राजनीतिक दलों के लिए चुनौती भी होंगे और अवसर भी।

उत्तराखंड की राजनीति उत्तर प्रदेश जैसी बिल्कुल नहीं

इस मामले में राजनीतिक विश्लेषक ये भी मानते हैं कि उत्तराखंड की राजनीति उत्तर प्रदेश जैसी बिल्कुल नहीं। हमारे राज्य ने जयानंद भारती, हरि प्रसाद टम्टा और खुशी राम आर्य जैसे कई दलित नेताओं और समाज सुधारकों को जन्म दिया है। इनकी सामाजिक स्वीकार्यता आज भी कई इलाकों में बनी हुई है। यानी उत्तराखंड में दलित समाज का अपना सामाजिक इतिहास है। अपना स्थानीय नेतृत्व है और अपना अलग राजनीतिक व्यवहार रहा है।

हालांकि अब राज्य में एक तरफ जहां बीजेपी समरसता के जरिए सामाजिक विस्तार का मोर्चा खोल रही है। वहीं कांग्रेस बसपा और भीम आर्मी अपने-अपने आधार को बचाने और बढ़ाने की चुनौती का सामना कर रही हैं।

कौन से मुद्दे तय करेंगे चुनाव की दिशा?

अब ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये समरसता संकल्प अभियान बीजेपी के लिए राजनीतिक बढ़त का रास्ता बनाएगा? क्या विपक्ष इस रणनीति की काट निकाल पाएगा?और सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या उत्तराखंड का मतदाता सामाजिक अभियानों से प्रभावित होगा? या इस बार रोजगार, महंगाई, विकास और स्थानीय मुद्दे ही चुनाव की दिशा तय करेंगे?