विकास की बत्ती गुल!, जिस अफसर के हाथ में पूरे राज्य की रोशनी, उसी के पैतृक गांव में अंधकार – Khabar Uttarakhand

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जिस अफसर के हाथों में पूरे राज्य के घर-घर तक बिजली पहुंचाने की कमान है। उस अफसर का अपना ही पैतृक गांव आज भी अंधेरे में डूबा है। जी हां, उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी UPCL के एमडी पीसी ध्यानी का अपना ही गांव तैड़िया भी उत्तराखंड के 60 गांवों की फहरीस्त में शामिल है जो आज भी बिजली के लिए तरस रहे हैं।

उत्तराखंड के 60 गांवों में आज तक नहीं पहुंची बिजली की लाइन

एक तरफ राजधानी देहरादून, जहां आसमान में झूलते तारों को जमीन के अंदर दफन कर स्मार्ट सिटी बनाई जा रही है। दूसरी तरफ पहाड़ के वो 60 गांव, जहां आजादी के इतने दशकों बाद भी बिजली का एक खंभा तक नहीं पहुंच पाया है। अब आखिर क्यों उत्तराखंड के 60 गांवों में आज तक बिजली की लाइन नहीं पहुंच पाई है। आखिर पहाड़ों पर क्यों थम गई है विकास की रफ्तार?

हाई टेंशन तारें बिछाना UPCL के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती

आज जब दुनिया चांद और मंगल पर बस्तियां बसाने की तैयारी कर रही है। तब उत्तराखंड में पहाड़ों पर रहने वाले लोगों की जिंदगी आज भी लालटेन की टिमटिमाती लौ के भरोसे चल रही है। बता दें की उत्तराखंड में ऐसे करीब 60 गांव हैं जहां बिजली के खंभे गाड़ना और हाई टेंशन तारें बिछाना UPCL के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बना हुआ है।

पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के MD के गांव में भी नहीं बिजली

इन गावों में उत्तराखंड पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के एमडी पीसी ध्यानी का अपना गांव तैड़िया भी शामिल है। अब यूपीसीएल के इन गांवों तक बिजली नहीं पहुंचाने की वजह वन विभाग की मंजूरी है।

ये सभी गांव घने जंगलों और अभयारण्यों के बीच या उनके आसपास बसे हैं। इसलिए यहां पर बिजली की पोल और तारें ले जाने के लिए फॉरेस्ट क्लीयरेंस यानी वन विभाग की इजाजत बेहद जरूरी होती है। जब तक वन विभाग से रही झंड़ी नहीं मिलती तब तक यूपीसीएक यहां पर एक खंभा भी नहीं गाड़ सकता।

सालों से अनुमति का इंतजार कर रहे गांव वाले

इसी अनुमति के इंतजार में सालों बीत गए, फाइलें एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर घूमती रहीं, लेकिन उसके बावजूद इस मसले को लेकर कोई प्रगति नहीं हुई। उन 60 गांवों की हजारों की आबादी आज भी रोज बिजली लाइन के सपने देख रही है। विभाग का दावा है कि फिलहाल इन 60 गांवों में सोलर एनर्जी के जरिए बिजली पहुंचाई जा रही है।

सोलर पैनल तो है लेकिन खराब मौसम में क्या?

घरों की छतों पर सोलर पैनल लगाए गए हैं ताकि रात के वक्त कम से कम एक दो बल्ब चल सकें। लेकिन जब पहाड़ों पर मौसम खराब होता है बादल छा जाते हैं या बारिश होती है। तो ये गांव वाले एक बार फिर उसी घुप अंधेरे में रहने को मजबूर हो जाते हैं।

राजधानी देहरादून में अंडरग्राउंड केबलिंग का काम तेज

हालांकि वहीं दूसरी तरफ राजधानी देहरादून में बिजली के पुराने लटकते और खतरनाक तारों से निजात दिलाने के लिए अंडरग्राउंड केबलिंग का काम तेजी से चलाया जा रहा है।

शहर की खूबसूरती बढ़ाने, हादसों को रोकने और निर्बाध बिजली सप्लाई के लिए तारों को जमीन के नीचे दबाया जा रहा है।
ये खबर कहीं ना कहीं उत्तराखंड की विकास नीति पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करती है।

वन विभाग और बिजली विभाग के बीच नहीं तालमेल

एक ही राज्य एक ही बिजली विभाग लेकिन वहीं एक तरफ राजधानी देहरादून है। दूसरी तरफ उत्तराखंड के वो 60 गांव जो आज भी अंधेरे में जीने को मजबूर हैं। हालांकि जब तक वन विभाग और बिजली विभाग के बीच तालमेल का पेंच नहीं सुलझता तब तक इन 60 गांवों के लिए बिजली सिर्फ एक दूर की कौड़ी ही बने रहेगी।