
सृष्टि के निर्माण के बाद ईश्वर ने पृथ्वी को सबसे सुंदर बहुमूल्य वरदान जो दिया था वह था जीवन के पनपने का, नवांकुरण का, नवजीवन, नवसृजन का। इन्हीं के कारण पृथ्वी का इतना सुंदर और विकसित रूप हमें देखने को मिलता है। विश्व का कोई भी समाज या देश बिना अपनी भाषा के,बिना अपने साहित्य के,न कभी उन्नति कर सका, न कभी समृद्ध हो सका। विश्व की सबसे प्राचीन भाषा होने का गौरव संस्कृत को मिला संस्कृत से ब्रह्मलिपि फिर हिंदी का जन्म हुआ। मुगलों ने अपने समय में उर्दू – फारसी को मुगल शासन का अभिन्न अंग मान खूब प्रचार प्रसार किया तो अंग्रेजों ने पूरे देश में अंग्रेजी का परचम लहराया। छोटे मोटे स्तर पर आपसी बोलचाल में ब्रज भाषा और खड़ी बोली का चलन था। पर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने देश के लिए एक भाषा के महत्व को गम्भीरता से समझ कर आधुनिक हिंदी को जन्म दिया। इसीलिए उन्हें आधुनिक हिन्दी का जनक कहा जाता है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने भी बहुत सुंदर शब्दों में भाषा को समग्र उन्नति समृद्धि का आधार कहा है – ‘निज भाषा उन्नति है सब उन्नति को मूल बिन् निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को शूल।’ आदम युग इसी कारण असभ्य और क्रूर था क्योंकि उस समय गूंज तो थी पर शब्द नहीं थे। मानव शोर से संकेत से अपनेऊ भाव को प्रकट कर सकता था पर शब्द बोली भाषा अक्षर ना होने के कारण उन भावों को बोल नहीं सकता था। जब से मानव ने जन्म लिया यदि तब से अब तक के उसके सबसे सुंदर आविष्कारों में से खोजा जाए तो शायद ही नहीं यह कटु सत्य है कि उसका सबसे महत्वपूर्ण और सुंदर आविष्कार अक्षर शब्द को, बोलियां को, लोकभाषा को ही माना जाएगा। भाषा के साथ उसकी संस्कृति भी विकसित होती गई जो उसके विकास, उन्नति, सभ्य, सुसंस्कृत होने की पहली सीढ़ी थी। कल्पना कीजिए यदि अक्षर, शब्द भाषा न होती तो हम आज कहां होते। स्वयं ऋषि मुनियों ने देवी देवताओं ने शब्द को ब्रह्म की संज्ञा दी।ब्रह्मा ने विश्व की रचना की तो शब्द ने सभ्यता संस्कृति को और सभ्यता संस्कृति ने साहित्य को जन्म दिया। किसी भी देश की सभ्यता संस्कृति तब तक गूंगी बहरी रहती है जब तक उसे देश के संपूर्ण क्षेत्र में बोलने लिखने पढ़ने और राज चलने वाली एक सर्वमान्य भाषा नहीं होती। सत्य तो यह है की भाषा किसी भी समाज, समुदाय,राष्ट्र की अस्मिता की पहचान होती है। शब्दों के निर्माण के बाद भाषा ने जन्म लिया और भाषा ने साहित्य सभ्यता संस्कृति का जन्म दिया। सम्भवत तभी किसी को कहना पड़ा ‘अंधकार है वहां जहां आदित्य नहीं है मुर्दा है वह देश जहां साहित्य नहीं है।’
15 अगस्त 1947 को हमारे देश को आजादी मिली है, अपने क्षेत्र पर अपना अधिकार मिला, अपनी पहचान के रूप में अपना तिरंगा लहराया, राष्ट्रगान के रूप में राष्ट्रगीत मिला, शासन प्रशासन चलाने के लिए अपना संविधान 30 जनवरी 1950 को मिला, पर राजभाषा के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। वह तब जाकर थोड़ा थम जब 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा के सदस्यों ने हिंदी के राजभाषा होने की औपचारिक घोषणा की। तब से 14 सितंबर, को पूरे देश में हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। लेकिन 15 वर्ष बाद 1966 में जाकर हिंदी को संविधान द्वारा राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की राष्ट्रभाषा उस देश का गौरव,उसका मान – सम्मान होती है, उसकी पहचान होती है। अनेक भाषाओं वाले देश में हिंदी को निरंतर संघर्ष करना पड़ रहा है। हमारे देश में भाषा की जटिल समस्या इस कारण है क्योंकि यहां अनेक भाषाएं बहुत समृद्ध संपन्न लोकप्रिय हैं। हमारे देश में इतने राज्य हैं इतनी भाषाएं हैं इतनी बोलियां हैं इतने धर्म इतनी जातियां हैं कि इतने बड़े इतने विशाल देश को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए भावात्मक रूप से सबको एक दूसरे से जोड़ने के लिए एक सर्वसम्मत भाषा, संपर्क भाषा, होना इस देश की एकता की पहली शर्त हो सकती है। पूर्व राष्ट्रपति स्व.डॉक्टर जाकिर हुसैन ने बहुत सुंदर शब्दों में कहा है कि – ‘इस मुल्क में बोली जाने वाली तरह-तरह की जुबानें अगर फूल हैं तो हिंदी ही वह धागा है जिसमें इन फूलों को पिरोकर कर इस देश के लिए खूबसूरत हार बन सकता है।’ राजभाषा हिंदी को लेकर जब कभी भी बहस होती है तो यह देखने में आता है कि अपने को महान बुद्धिजीवी साबित करने के लिए लोग अंग्रेजी की आलोचना प्रारंभ कर देते हैं और सारा समय इसी में व्यतीत कर देते हैं। यह प्रवृत्ति सही नहीं कही जा सकती। प्रश्न है कि हम हिंदी के प्रचार-प्रसार उत्थान में कितना योगदान दे रहे हैं। भाषा कोई भी बुरी नहीं होती। अंग्रेजी का अपना एक अलग महत्व है, इसे विश्व का कोई देश नकार नहीं सकता। आलोचना अंग्रेजी की नहीं हमारी स्वयं की होनी चाहिए पर क्या हम इतना साहस रखते हैं।
अपनी भाषा अपने साहित्य के प्रति सभी को गर्व होता है और हो भी क्यों नहीं, मैथिली शरण गुप्त जी ने सही कहा है – ‘जिसे न निज भाषा तथा निज देश पर अभिमान है वह नर नहीं नर पशु निरा और मृतक समान है।’ हिंदी इतनी प्यारी भाषा है की स्वत: ही किसी को कहना पड़ा ‘गुप्त रहीम पंत की मानस गंगा हिंदी,भारत माता के माथे की बिंदी झिलमिल हिंदी।’
देखा जाए तो आज सारा ध्यान हिंदी के प्रचार प्रसार पर दिया जा रहा, इस पर अरबों रुपए खर्च किए जा रहे हैं पर इसकी समृद्धि इसकी सुंदरता इसकी लोकप्रियता पर कुछ भी नहीं। हिंदी के ठेकेदारों ने हिंदी के समुचित विकास के लिए उसको लोकप्रिय बनाने के लिए आखिर किया। यह प्रश्न उठता है। राजभाषा का दर्जा देने मात्र से, हिंदी का मंचों पर कीर्तन कर देने मात्र से,अंग्रेजी की आलोचना में समय गंवाने से, अखबारों में वक्तव्य और फोटो खिंचवाने,भाषण देने मात्र से अगर हिंदी का विकास हुआ होता तो आज विश्व हिंदी दिवस मनाने की जरूरत नहीं होती। और वह विश्व भाषा होती। हिंदी के तथाकथित साहित्यकार ठेकेदार राजभाषा अधिकारी जो हिंदी के लिए बहुत कुछ कर सकते थे उनका उद्देश्य मात्र हिंदी को अपने नाम के हित में भुनाना तक सीमित रहा। अधिक अच्छा कार्य तो समाचार पत्रों, हिंदी फिल्मों ने, कुलियों ने मजदूरों ने किया। सबसे दुर्भाग्य तो यह रहा कि हिंदी को बोली, भाषा, साहित्य भाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा, राज्यभाषा, ही नहीं विभिन्न प्रांतों की भाषाओं से रस्साकसी के चक्रव्यूह में फंसा दिया गया।
जबकि इसके भविष्य को समृद्ध सुंदर लोकप्रिय बनाने के लिए,नई पीढ़ी में इसके प्रति रुझान पैदा करने का उत्तरदायित्व हिंदी विद्वानों का और साहित्यकारों का था जो उन्होंने नहीं किया। वह सिर्फ अपनी और मेरी हिंदी तक सिमिट कर रह गए। आज देश की समस्त हिंदी पत्रिकाओं को वह साहित्यकार सहयोग दे रहा है चला रहा है जिसके नाम पर मठाधीश नाक भौं सिकोड़ने लग जाते हैं। अब तक की सबसे बड़ी और लोकप्रिय हिंदी की पत्रिकाओं को बंद करने का श्रेय भी इन्हें ही दिया जाता है। अपनी राजनीतिक जोड़ तोड़ के कारण यह बड़े-बड़े सरकारी पुरस्कार हड़प पर जाते हैं। इनकी पुस्तकें इतनी महंगी होती हैं जिससे आम पाठक इन्हें नहीं पढ़ पाता,न ही अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर पाता है। यह बड़े-बड़े पुस्तकालय और लाइब्रेरीयों में बंद होकर रह जाती हैं,फिर भी इन्हें बड़े-बड़े पुरस्कार प्राप्त हो जाते हैं । ऐसे साहित्य का क्या अर्थ रह जाता है जो आम पाठक तक नहीं पहुंच पाता। यह कैसे लोकप्रिय साहित्यिक श्रेणी में आ जाता है समझ से परे की बात है।
इन स्वाधीनता के 77 वर्षों में जिस हिंदी का कभी विरोध होता था,वह देश में पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक बोली जा रही है, पढ़ी जा रही है लिखी जा रही है और जितना देश को एकता के सूत्र में पिरोने का काम कर रही है उतना किसी अन्य माध्यम से नहीं हो रहा है। देश में अंग्रेजी फारसी का जो वर्चस्व 60 वर्ष पहले था उसे हिंदी ने अपनी लोकप्रियता के कारण हाशिये पर ला दिया है।
इसी लोकप्रिय को देखकर कहा गया है -‘हिंदी में है प्राण सूर् के इसमें हैं तुलसी के राम इसको गाकर करना नाची मीरा इसमें बसते हैं घनश्याम।’
हिंदी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से हमारे देश में चार-चार पदों को सुशोभित कर रही है जैसे राष्ट्रभाषा, राजभाषा, राज्य भाषा और संपूर्ण देश को एकता का सूत्र में जोड़ने वाली संपर्क भाषा। इसे विज्ञान तकनीकी और प्रशासनिक भाषा के रूप में आगे लाना है, पर यह ध्यान रखना आवश्यक है इसके अधिक से अधिक प्रयोग वह लोकप्रियता के लिए यह सरल सुबोध बोधगम्य में हो, और भाषा ऐसी हो जो सबके समझ में आए। दो-चार बुद्धिजीवों के समझ में आने से कोई भाषा राजभाषा नहीं हो सकती है यह हमें अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। राजभाषा के रूप में इसमें कार्य करना, इसका प्रचार – प्रसार करना हमारा संवैधानिक अधिकार ही नहीं कर्तव्य भी है। देश को एकता के सूत्र में पिरोने का एक ही रास्ता है -हिंदी भाषा अन्य कोई नहीं। हिंदी भावात्मक भाषा है जिसे भारत का पर्यायवाची कहा जा सकता है। अपनी सभ्यता संस्कृति समृद्धि को ऊंचा उठाने तथा इसके विश्व में प्रचार प्रसार का कार्य हम हिंदी भाषा तथा उसके साहित्य से ही कर सकते हैं।
यदि हम सिर्फ हिंदी को देश के लोगों के अंदर से तोड़ दें तो देश को तोड़ना बहुत आसान हो जाएगा। देश की मजबूती, समृद्धि हिंदी भाषा के माध्यम से ही कायम रह सकती है। हिंदी को खतरा अंग्रेजी से उतना नहीं है जितना हिंदी के व्यवसायियों से व्यापारियों से दलालों से माफियाओं से है। हिंदी के नाम पर लोग सरकारी पैसे से ऐश करते हैं,विदेश यात्रा करते हैं,पर नई पीढ़ी को हिंदी की साहित्य की धारा में लाने के लिए कुछ नहीं करते। इस पर भी हिंदी की गत दशकों की यात्रा गंगा की तरह बहती पवित्र, निर्मल, शब्दों, भाषा, साहित्य की यात्रा रही है। इसको सुंदर संस्कृति के रूप में पल्लवित पुष्पित होते रहने के प्रयास की जाने चाहिए। नयी पीढ़ी को हिंदी की मुख्य धारा में लाने के लिए इसके भविष्य के पर्यावरण को और भी सुंदर और शुद्ध बनाने के सभी को प्रयास करने चाहिए। हिंदी हिंदी चिल्लाने से हिंदी का भविष्य उज्जवल नहीं होगा इसके लिए हम सब को निस्वार्थ भाव से काम करना होगा। तभी वह सुंदर और लोकप्रिय भी बनेगी, जिस पर हमारी सभ्यता संस्कृति की ही नहीं हमारे समग्र विकास समृद्धि उन्नति की एक सुंदर इमारत खड़ी हो सकेगी। देश में समय-समय पर आयोजित हिंदी अधिवेशन का प्रयास होना चाहिए कि हम लोगों में हिंदी और उसके साहित्य के प्रति सम्मान की भावना भर सकें,ऐसा देश की सभी भाषाओं को सम्मान देते हुए करना चाहिए।
हिंदी की जब कभी बात आती है बरबस राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी की यह खूबसूरत पंक्तियाँ मन में दिल में उतर आती हैं-

-“मानस भवन में आर्यजन जिनकी उतारें आरती, भगवान भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती” हम सब का यही प्रयास होना चाहिए।
अंत में इतनी ही ईच्छा है —
होंठों पर हमेशा जन गण मन राष्ट्र गान रखना
दिल में हमेशा राष्ट्र के प्रति आदर सेवा सम्मान रखना
बोली भाषा जो भी बोलना चाहो,बोलना तुम
मगर कश्मीर से कन्या कुमारी तक
कच्छ के रण से अरूणाचल तक
एक हिंदी एक हिन्दुस्तान रखना।

