पहाड़ी गांवों के लिए उम्मीदः टिहरी के गांव में आईआईटी रुड़की ने सूखे के दिनों में भी दोगुना कर दिया पानी

पहाड़ों में जीवन जितना खूबसूरत है, पानी की किल्लत इसे उतना ही कठिन बना देती है। गर्मियों के आते ही हिमालयी क्षेत्रों के प्राकृतिक नौले, धारे और गधेरे (जलस्रोत) सूखने लगते हैं। दूर-दराज के गांवों में महिलाओं और बुजुर्गों को एक-एक बाल्टी पानी के लिए घंटों भटकना पड़ता है। लेकिन उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल स्थित ऊंचौन गांव में इस बार तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। जिस गांव में सूखे के दिनों में पानी की बूंद-बूंद को तरसना पड़ता था, वहां अब नल-धारों से दोगुना पानी बह रहा है।

यह चमत्कार किसी जादू से नहीं, बल्कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की के वैज्ञानिकों की सोच, मेहनत और सटीक भू-वैज्ञानिक खोज का नतीजा है। आईआईटी रुड़की के पृथ्वी विज्ञान विभाग की टीम ने अपने वैज्ञानिक अनुसंधान के बल पर गांव में एक नया और टिकाऊ जलस्रोत विकसित कर दिया है। इसका असर यह हुआ कि सूखे और कम पानी वाले मौसम में भी गांव में रोजाना मिलने वाला पानी 500 लीटर से सीधा बढ़कर 1000 लीटर या उससे भी अधिक हो गया है।

क्या थी असली समस्या और कैसे शुरू हुई तलाश?

हिमालयी क्षेत्र में करीब 50 फीसदी प्राकृतिक जलस्रोत या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या फिर गर्मियों में उनका पानी बहुत कम रह जाता है। दूर-दराज की बस्तियों में जब पानी का कोई और जरिया नहीं होता, तो ग्रामीणों के सामने भारी संकट खड़ा हो जाता है। इसी समस्या के पक्के समाधान के लिए भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय के ‘राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन’ (नमामि गंगे) के तहत एक विशेष परियोजना शुरू की गई—“टिहरी जिले के तकोली गाड जलग्रहण क्षेत्र में सूखते जलस्रोतों का पुनर्जीवन”। इस पूरी परियोजना की कमान आईआईटी रुड़की के हाथ में सौंपी गई और पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर अभयानंद सिंह मौर्य को इसका मुख्य अन्वेषक (प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर) बनाया गया। वैज्ञानिकों ने अलकनंदा नदी बेसिन के अंतर्गत लगभग 143 वर्ग किलोमीटर में फैले तकोली गाड इलाके का बारीक अध्ययन शुरू किया। लक्ष्य एक ही था—यह समझना कि आखिर पहाड़ों के पेट में पानी रुकता कहां है और बहकर जाता कहां है?

लैब से जमीन तक: दो बड़े वैज्ञानिक अध्ययनों की सफलता

आईआईटी रुड़की की टीम ने अपनी खोज को मजबूत करने के लिए दो अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययन किए। ‘हाइड्रोलॉजिकल साइंसेज जर्नल’ में प्रकाशित पहले शोध में वैज्ञानिकों ने स्थिर और रेडियो समस्थानिकों (Isotopes) और ट्रिटियम मापन तकनीक का इस्तेमाल किया। इससे यह साफ हुआ कि पहाड़ों में जमीन के अंदर जमा होने वाले पानी में 82 प्रतिशत योगदान मानसूनी बारिश का होता है। शीतकालीन बारिश केवल 10 प्रतिशत और मानसून-पूर्व की बारिश 8 प्रतिशत योगदान देती है। यानी मानसून का पानी ही पूरे साल पहाड़ों की प्यास बुझाता है। ‘एप्लाइड जियोकेमिस्ट्री’ में प्रकाशित दूसरे शोध में यह देखा गया कि पहाड़ों की भूगर्भीय संरचना और चट्टानें पानी की रासायनिक गुणवत्ता को कैसे प्रभावित करती हैं। इसमें पाया गया कि चूना पत्थर (कार्बोनेट शैल) का अपक्षय और मानसूनी रीचार्ज पानी के गुणों को तय करते हैं।

ऐसे बना नया जलस्रोत: भू-भौतिकी का सटीक गणित

इन दोनों अध्ययनों से मिली जानकारियों को कागजों से निकालकर जमीन पर आजमाया गया। वैज्ञानिकों ने भू-भौतिकीय जांच (Geophysical Investigation) के जरिए जमीन के अंदर उन चट्टानी परतों की पहचान की, जिनके भीतर पानी रोकने और उसे आगे बहाने की क्षमता थी। चट्टानों की गहराई का अंदाजा लगाने के बाद ऊंचौन गांव (कीर्तिनगर ब्लॉक, तकोली पोस्ट) के ऊपरी ढलान पर कई विशेष खाइयां बनाई गईं। जब बारिश हुई, तो इन खाइयों ने तेजी से बहकर निकल जाने वाले पानी की रफ्तार धीमी कर दी। इससे पानी को जमीन के भीतर रिसने का भरपूर मौका मिला और भूजल का स्तर तेजी से बढ़ गया। इसके बाद चिन्हित किए गए वाटर-बेयरिंग ज़ोन से पानी को बाहर निकालने के लिए एक नियंत्रित रास्ता तैयार किया गया। नतीजा यह हुआ कि चंद्रबदनी मंदिर मार्ग के किनारे एक नया और लबालब जलस्रोत उभर आया।

ऊंचौन गांव में छाई खुशी, महिलाओं को बहुत बड़ी राहत मिली

अब ऊंचौन गांव के परिवारों को गर्मियों में पानी की किल्लत से जूझना नहीं पड़ेगा। पीने के साफ पानी की उपलब्धता दोगुनी होने से स्थानीय ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं को बहुत बड़ी राहत मिली है। आईआईटी रुड़की के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रो. अभयानंद सिंह मौर्य ने बताया-“हिमालयी इलाकों में जल संकट को दूर करने के लिए पानी के स्रोत, उसके बहाव और मौसमी बदलाव को गहराई से समझना बेहद जरूरी है। हमारे रिसर्च ने साबित किया कि मानसूनी रीचार्ज और भूवैज्ञानिक परिस्थितियां पानी को बचाए रखने में कितनी बड़ी भूमिका निभाती हैं। इसी वैज्ञानिक समझ के आधार पर हम गांव में सटीक जगह पर पानी निकालने में कामयाब रहे।”

आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. के. के. पंत ने इस सफलता पर खुशी जताते हुए कहा-“वैज्ञानिक शोध का असली मकसद तभी पूरा होता है जब उसका लाभ आम जनता को मिले। हिमालयी जल प्रणालियों को समझने की हमारी कोशिशें इसी सोच का हिस्सा हैं। ऊंचौन गांव का यह सफल मॉडल दिखाता है कि सही तकनीक और स्थानीय जरूरतों का तालमेल बनाकर हम पूरे हिमालयी क्षेत्र में जल सुरक्षा की नई मिसाल कायम कर सकते हैं।”

अन्य हिमालयी गांवों के लिए बनी नई राह

ऊंचौन गांव का यह प्रयोग केवल एक गांव की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे उत्तराखंड और हिमालयी राज्यों के हजारों गांवों के लिए एक ‘ब्लूप्रिंट’ की तरह है। अगर इसी वैज्ञानिक सोच, भूगर्भीय जांच और स्थानीय सहभागिता को मिलाकर अन्य सूख चुके जलस्रोतों पर काम किया जाए, तो पहाड़ों से हो रहे पलायन को रोकने और जल संकट को हमेशा के लिए खत्म करने में बहुत बड़ी कामयाबी मिल सकती है। आईआईटी रुड़की की इस पहल ने साबित कर दिया है कि जब विज्ञान और प्रकृति का सही मेल होता है, तो सुखाड़ में भी अमृत धारा बह निकलती है।

Khabar Uttarakhand – Uttarakhand News.

❌ Content Protection Enabled: Right-click & text copying is disabled on this website.