कल्पना कीजिए… समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर शून्य से नीचे जमता तापमान, तेज बर्फीली हवाएं, सांस फुला देने वाली ऑक्सीजन की कमी और चारों तरफ फैले विशालकाय हिमनद (ग्लेशियर)। ऐसे कठिन माहौल में जहां इंसान का चंद घंटे टिकना मुश्किल होता है, वहां हमारे वैज्ञानिकों की एक टीम ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है जो आने वाले समय में उत्तराखंड के लाखों लोगों की जिंदगी की रक्षा करेगा।
वसुंधरा ताल में लगा देश का आधुनिक ‘अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’
उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित प्रसिद्ध वसुंधरा ताल (ग्लेशियल झील) में देश की सबसे आधुनिक ‘अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’ (पूर्व चेतावनी प्रणाली) का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। इस बेहद चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरे मिशन को पूरा करके वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का दल देहरादून लौट आया है।
मंगलवार को जब यह जांबाज दल वापस पहुंचा, तो ‘उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण’ (USDMA) में आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने सभी वैज्ञानिकों और सुरक्षा बलों के जवानों का गर्मजोशी से इस्तकबाल किया। राज्य में किसी ग्लेशियल झील पर इस तरह का आधुनिक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाने का यह पहला प्रयोग है, जो आपदा प्रबंधन के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।
क्या था यह मिशन और क्यों थी इसकी जरूरत?
हिमालयी क्षेत्रों में पिछले कुछ सालों में जिस तरह से मौसम बदल रहा है, उससे ग्लेशियरों के पिघलने और उनके बीच में बनी झीलों के टूटने (जिसे वैज्ञानिक भाषा में GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood कहते हैं) का खतरा काफी बढ़ गया है। केदारनाथ और चमोली की पुरानी घटनाओं को याद करें तो समझ आता है कि अगर झील अचानक टूटती है, तो निचले इलाकों में तबाही मचा देती है।
इसी खतरे को समय रहते भांपने के लिए राज्य सरकार ने राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत वसुंधरा ताल को चुना। गत 29 सितंबर को मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने इस दल को झंडी दिखाकर रवाना किया था। वैज्ञानिकों का मकसद साफ था—वसुंधरा ताल में ऐसे आधुनिक सेंसर और उपकरण लगाना, जो झील के अंदर और बाहर होने वाली हर छोटी-से-छोटी प्राकृतिक हलचल की जानकारी सीधे देहरादून और रुड़की में बैठे अधिकारियों तक पहुंचा सकें।
मुख्यमंत्री धामी और आपदा प्रबंधन मंत्री कौशिक ने जताई खुशी
इस ऐतिहासिक सफलता पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बेहद प्रसन्नता जताई है। उन्होंने कहा- “उत्तराखंड जैसे कठिन पर्वतीय राज्य में प्राकृतिक आपदाओं के खतरे की समय रहते पहचान करना सबसे जरूरी है। आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक रिसर्च और सभी सरकारी संस्थाओं के तालमेल से हम अपनी आपदा प्रबंधन व्यवस्था को और मजबूत बना रहे हैं। वसुंधरा ताल में लगी यह प्रणाली हिमालय के दुर्गम क्षेत्रों में संभावित खतरों की निगरानी करेगी और संवेदनशील इलाकों में रहने वाले हमारे नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी।”
वहीं, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने इस अभियान की सफलता के लिए वैज्ञानिकों और जवानों की तारीफ करते हुए कहा कि अब हमें मौसम, बर्फबारी और झील के जलस्तर से जुड़े सटीक वैज्ञानिक आंकड़े मिलेंगे, जिससे समय रहते सुरक्षा के कदम उठाए जा सकेंगे।
38.5 मीटर गहरी झील और शून्य के नीचे काम करने की चुनौती
केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की के वरिष्ठ वैज्ञानिक और इस अभियान दल के नेतृत्वकर्ता डॉ. डीपी कानूनगो ने वसुंधरा ताल के बारे में कई दिलचस्प बातें साझा कीं। उन्होंने बताया कि वसुंधरा ताल लगभग 38.50 मीटर (करीब 126 फीट) गहरी, 600 मीटर चौड़ी और 900 मीटर लंबी है। वैज्ञानिकों ने पुराने आंकड़ों और वर्तमान स्थिति का मिलान किया तो पाया कि फिलहाल झील के आकार या जलस्तर में कोई असामान्य बदलाव नहीं हुआ है।चेतावनी प्रणाली को झील के पास एक ऐसी जगह स्थापित किया गया है, जहां अचानक भूस्खलन (लैंडस्लाइड) या हिमस्खलन (एवलांच) गिरने का खतरा कम से कम हो, ताकि उपकरण सुरक्षित रहें।
दुर्गम पहाड़ों में भारी-भरकम वैज्ञानिक उपकरणों को ले जाना, उन्हें झील के बर्फीले पानी में स्थापित करना और वहां तेज बर्फीली हवाओं के बीच काम करना किसी बड़े जोखिम से कम नहीं था। इस काम में CBRI रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान (WIHG) के वैज्ञानिकों के साथ-साथ SDRF, NDRF और ITBP के जवानों ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया।
तकनीक का कमाल: जानिए ताल में कौन-कौन से ‘सुपर सेंसर’ लगे हैं?
वसुंधरा ताल में लगे ये उपकरण किसी इंसान की तरह 24 घंटे जागकर ताल की रखवाली करेंगे। इसमें कई तरह के अत्याधुनिक सेंसर लगाए गए हैं-
ऑल-इन-वन मौसम सेंसर: यह सेंसर हवा की रफ्तार, हवा की दिशा, बारिश की मात्रा, धूप (सौर विकिरण), तापमान और हवा के दबाव को हर पल मापेगा।
जलस्तर जांचने वाले सेंसर: झील का पानी कितना बढ़ या घट रहा है, यह मापने के लिए पानी पर तैरने वाले (Floating) और पानी के अंदर डूबे रहने वाले (Submerged) दो विशेष वाटर लेवल सेंसर लगाए गए हैं।
भू-गतिविधि और कंपन सेंसर: अगर आसपास कोई चट्टान खिसकती है या भूकम्पीय हलचल होती है, तो उसके लिए 02 एक्सेलेरोमीटर और टिल्ट सेंसर लगाए गए हैं।
हिमस्खलन (एवलांच) सेंसर: बर्फ खिसकने का पता लगाने के लिए अलग से टिल्ट और एक्सेलेरोमीटर सेंसर लगा है।
बर्फ और तापमान की गहराई नापने वाले सेंसर: झील की सतह से लेकर नीचे बर्फीली गहराई तक के तापमान को मापने के लिए 8 तापमान सेंसर (7 पानी के अंदर/नीचे और 1 सतह पर) और बर्फ की मोटाई मापने के लिए स्नो डेप्थ सेंसर लगाया गया है।
मोबाइल नेटवर्क नहीं, तो सैटेलाइट से पहुंचेगी खबर
वसुंधरा ताल इतनी ऊंचाई और गहराई में है कि वहां सामान्य मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करता। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह था कि सेंसर से मिलने वाला डेटा नीचे शहर तक कैसे पहुंचेगा? वैज्ञानिकों ने इसके लिए इरिडियम सैटेलाइट कम्युनिकेशन (Iridium Satellite Communication) तकनीक का इस्तेमाल किया है।
हर 2 घंटे में अपडेट: सामान्य दिनों में ये सेंसर हर 2 घंटे में झील का पूरा डेटा (मौसम, जलस्तर, तापमान) सीधे CBRI रुड़की और USDMA देहरादून के कंट्रोल रूम/डैशबोर्ड पर भेजेंगे।
इमरजेंसी में ‘रियल टाइम’ अलर्ट: अगर झील में अचानक पानी बढ़ता है या कोई भूस्खलन होता है, तो ये सेंसर 2 घंटे का इंतजार किए बिना तुरंत (Instant Alert) कंट्रोल रूम को मैसेज भेज देंगे, जिससे आपदा प्रबंधन टीम बिना वक्त गंवाए अलर्ट जारी कर सकेगी।
धूप न भी खिले, तो 10 दिन तक काम करेगी पावरफुल बैटरी
उच्च हिमालयी इलाकों में हफ्तों तक बादल छाए रहते हैं और सूरज के दर्शन नहीं होते। ऐसे में उपकरणों को बिजली कैसे मिलेगी?
इसके लिए पूरी प्रणाली को सोलर पैनल और 280 एम्पीयर क्षमता की पावरफुल बैटरी से जोड़ा गया है। अगर लगातार 10 दिनों तक धूप न निकले और मौसम कितना भी खराब रहे, तब भी यह सिस्टम बिना रुके काम करता रहेगा। वैज्ञानिकों ने वापस लौटने से पहले पूरे सिस्टम को टेस्ट कर लिया है और डेटा बिल्कुल सही तरीके से देहरादून पहुंच रहा है।
आने वाले कल के लिए क्यों खास है यह उपलब्धि ?
उत्तराखंड के लिए यह सिर्फ एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं, बल्कि लाखों जिंदगियों की सुरक्षा का ‘कवच’ है। जैसा कि आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन और प्रो. आर. प्रदीप कुमार (निदेशक, CBRI) ने बताया, वसुंधरा ताल में मिली इस सफलता के आधार पर अब राज्य की अन्य संवेदनशील ग्लेशियल झीलों पर भी इसी तरह की पूर्व चेतावनी प्रणालियां लगाई जाएंगी।
इस सफल अभियान में वैज्ञानिक डॉ. डी.पी. कानूनगो, डॉ. एस.के. पाणीग्रही, डॉ. कौशिक पंडित, चंद्रभान पटेल, कांतिलाल सोलंकी, डॉ. राजेश कुमार दास, अजीत सिंह गहरवार और आदित्य भगत समेत कई विशेषज्ञों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
अब जब भी वसुंधरा ताल के आसपास मौसम बिगड़ेगा या झील का पानी खतरे के निशान की तरफ बढ़ेगा, तो नीचे घाटी में बसे गांवों और कस्बों तक खतरा पहुंचने से पहले ही चेतावनी का अलार्म बज जाएगा!
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