योगनगरी की 2027 के लिए बिसात: कौन बनेगा ‘ऋषिकेश नरेश’?

Uttarakhand Election 2027 Rishikesh Seat: उत्तराखंड की राजनीति में ऋषिकेश विधानसभा सीट केवल एक चुनावी हलका नहीं, बल्कि सूबे के सियासी मिजाज का थर्मामीटर मानी जाती है। गढ़वाल का प्रवेश द्वार, विश्वविख्यात योग नगरी और प्रमुख पर्यटन केंद्र होने के नाते इस सीट पर होने वाली हर राजनीतिक हलचल की गूंज पूरे प्रदेश में सुनाई देती है। 2027 के विधानसभा चुनावों में अभी वक्त है, मगर, ऋषिकेश के चौक-चौराहों, चाय की दुकानों और गंगा घाटों पर राजनीतिक गोटियों की बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।

उत्तराखंड चुनाव 2027 ऋषिकेश सीट Uttarakhand Election 2027 Rishikesh Seat

दरअसल इस सीट पर ऋषिकेश में 202 में हार-जीत का अंतर 19,057 था। मगर प्री-एसआईआर में 27,120 वोट तो एसआईआर में 31,089  वोट यानी कुल 58,209 वोट कट गए है, जो कि हार जीत के अंतर से 39,152 ज्यादा यानी तीन गुने से अधिक है।  इन हालात में यह सवाल गहरा रहा है कि क्या भाजपा अपने इस गढ़ को बचा पाएगी, या फिर सत्ता विरोधी लहर और अंदरूनी खींचतान का फायदा उठाकर कांग्रेस और क्षेत्रीय दल यहां कोई नया सियासी समीकरण गढ़ेंगे?

दो दशक से भाजपा का एकछत्र राज

2002 में उत्तराखंड के पहले विधानसभा चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस के शूरवीर सिंह सजवाण ने परचम फहराया था। लेकिन 2007 के चुनाव में भाजपा के प्रेमचंद अग्रवाल ने जो जीत दर्ज की, उसके बाद ऋषिकेश भगवा पार्टी का अभेद्य दुर्ग बन गया। प्रेमचंद अग्रवाल ने 2007, 2012, 2017 और 2022 में लगातार चार बार जीत की हैट्रिक से आगे बढ़कर चौका जड़ा। 2012 क चुनाव में प्रेमचंद अग्रवाल ने कांग्रेस के राजपाल खरोला को बेहद कांटे के मुकाबले में मात दी थी।

2022 में भी प्रेमचंद ने अपनी सीट रखी बरकरार

2017 में प्रचंड मोदी लहर के बीच प्रेमचंद ने राजपाल खरोला और निर्दलीय संदीप गुप्ता की तगड़ी घेराबंदी के बावजूद अपनी सीट बरकरार रखी। 2022 में विधानसभा भर्ती विवाद और स्थानीय स्तर पर विरोध के तमाम दावों के बावजूद प्रेमचंद अग्रवाल ने कांग्रेस प्रत्याशी जयेंद्र चंद रमोला को 19,057 वोटों के भारी-भरकम अंतर से हराकर अपनी सियासी बादशाहत साबित की।

वोटों का गणित: शहरी कोर-वोटर बनाम ग्रामीण असंतोष

ऋषिकेश का जनसांख्यिकीय और सामाजिक ढांचा इसे मैदान और पहाड़ के अनूठे संगम के रूप में ढालता है। यहाँ की चुनावी जंग मुख्य रूप से शहरी और ग्रामीण मतदाताओं के दो ध्रुवों पर टिकी होती है। नगर निगम क्षेत्र, आवास विकास, बीपीएल कॉलोनियों और गंगा तटीय इलाकों में व्यापारी, ब्राह्मण और वैश्य समाज की बहुलता है। यह वर्ग पारंपरिक रूप से भाजपा का ‘कैडर वोट’ माना जाता है। नगर क्षेत्र से मिलने वाली एकतरफा लीड ही हर बार भाजपा की जीत का मुख्य आधार बनती रही है।

रायवाला, छिद्दरवाला, वीरभद्र और आसपास की न्याय पंचायतों में ठाकुर-राजपूत और किसान मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ग्रामीण इलाकों में कृषि भूमि के अधिकार, जलभराव, बाढ़ सुरक्षा और बुनियादी ढाँचे जैसे स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं, जहाँ कांग्रेस सेंधमारी की भरपूर कोशिश करती है। क्षेत्र में ओबीसी, पंजाबी और पूर्वांचली समुदाय के मतदाताओं की भी अच्छी-खासी संख्या है, जो हार-जीत के अंतर को तय करने में अहम रोल निभाते हैं।

2027 की बिसात: भाजपा में टिकट की होड़ और कांग्रेस की गुटबाजी

2027 का महासंग्राम ऋषिकेश के लिए बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ भाजपा के भीतर 20 साल के लंबे कार्यकाल के बाद बदलाव की सुगबुगाहट और नए चेहरों की लंबी कतार है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने अपने बिखराव को समेटने की कठिन चुनौती है।

भारतीय जनता पार्टी में क्या बदलेगा चेहरा?

भाजपा में इस बार दावेदारों की लंबी सूची है। कैबिनेट मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल अपने चार बार के विधायक होने के अनुभव, विकास कार्यों के दावों और मजबूत कैडर नेटवर्क के बल पर स्वाभाविक दावेदार हैं। हालांकि, लगातार 20 साल का कार्यकाल और बीते दिनों के कुछ विवाद उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती बने हुए हैं। इसके अलावा, टिकट की दौड़ में कई बड़े और मजबूत नाम सामने आ रहे हैं।

मसलन, कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल, महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कंडवाल, पूर्व मेयर अनीता ममगांई ,पूर्व जिलाध्यक्ष रविंद्र सिंह राणा, पार्टी के समर्पित संगठनात्मक चेहरा जिला महामंत्री प्रतीक कालिया, राज्य मंत्री गिरीश डोभाल और स्थानीय पकड़ रखने वाले संदीप गुप्ता। मगर संदीप गुप्ता के कुछ बयान उन पर भारी पड़ सकते हैं। भाजपा आलाकमान एंटी-इंकमबेंसी से निपटने के लिए राज्य भर में ‘नो-रिपीट’ या चेहरा बदलने का फॉर्मूला अपनाता है, तो ऋषिकेश में इनमें से किसी एक नाम पर लॉटरी खुल सकती है।

कांग्रेस की अंतर्कलह सबसे बड़ी बाधा

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी फांस उसकी अंदरूनी गुटबाजी रही है।2022 में प्रत्याशी रहे जयेंद्र चंद रमोला रमोला लगातार धरातल पर सक्रिय हैं और युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं। वहीं दो बार चुनाव लड़ चुके राजपाल सिंह खरोला का अपना पुराना कैडर आधार है और वे भी दावेदारी में पीछे नहीं हैं। संजय गुप्ता व अन्य स्थानीय नेता भी दावेदार हैं पर कांग्रेस अगर एक मंच पर आकर एक सर्वसम्मत चेहरा उतार पाती है, तभी वह भाजपा के इस गढ़ में सेंध लगा पाएगी।

क्या निर्दलीय बिगाड़ेंगे खेल?

ऋषिकेश का चुनाव केवल दो राष्ट्रीय दलों तक सीमित नहीं रहता। 2022 के चुनाव में उत्तराखंड जनएकता पार्टी से लड़े कनक धनै ने 13,000 से अधिक वोट हासिल कर यह साफ कर दिया था कि यहाँ निर्दलीय और क्षेत्रीय दल खेल बनाने और बिगाड़ने की पूरी ताकत रखते हैं। हालांकि अभी कनक धनै भाजपा में हैं पर उन पर कुछ संगीन आरोप हैं तो भाजपा में उनकी उम्मीदवारी की उम्मीद बहुत कम है। मगर, 2027 में उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) या कोई मजबूत निर्दलीय चेहरा भाजपा-कांग्रेस दोनों के समीकरणों में उलटफेर कर सकता है।

बदलाव की बयार, या फिर दोहराया जाएगा इतिहास?

ऋषिकेश में वोटो की जंग इसलिए और दिलचस्प हो गई है क्योंकि  वहां भारी तदाद में वोट कट चुके हैं जो पूरे समीकरण बिगाड़ने  के लिए काफी है। 2027 में ऋषिकेश की जंग केवल दो पार्टियों का मुकाबला नहीं होगी, बल्कि यह भाजपा के लिए चुनौती अपने शहरी वोट बैंक को एकजुट रखने और सत्ता विरोधी लहर को शांत करने की होगी। वहीं, कांग्रेस के लिए चुनौती गुटबाजी से ऊपर उठकर जनता के सामने एक एकजुट और भरोसेमंद विकल्प पेश करने की है। यदि विपक्ष ने एक मजबूत और सर्वसम्मत प्रत्याशी मैदान में उतारा, तो इस बार ऋषिकेश की राह किसी के लिए आसान नहीं रहने वाली।

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